वन नेशन, वन इलेक्शन और लोकतान्त्रिक बहुलतावाद
वन नेशन,
वन इलेक्शन
प्रमुख आयाम
1.
‘वन
नेशन, वन इलेक्शन’ से आशय:
2.
लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खण्डित तारतम्यता
3.
भारतीय प्रधानमंत्री का प्रस्ताव
4. नीति आयोग और चुनाव आयोग को अनुकूल माहौल बनाने की जिम्मेवारी
5. अलग-अलग चुनाव के
दुष्परिणाम
6. नीति आयोग के सुझाव
7. संसद की स्थायी समिति की सिफारिशें
8. साथ-साथ चुनाव के नुकसान
9.
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से आशय:
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’
का मतलब है भारत में चुनाव-चक्र की इस प्रकार पुनर्संरचना, कि लोकसभा और विधानसभा,
दोनों के चुनाव एक ही समय पर साथ-साथ हों; जैसा कि भारतीय राजनीति में सन् 1967 के
पहले तक होता था। अब
प्रश्न यह उठता है कि आज अचानक से ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की चर्चा क्यों हो रही
है? इसके पीछे क्या तर्क गढ़े जा रहे हैं? यह
विचार भारत के बहुदलीय लोकतंत्र को और बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था को किन रूपों में
प्रभावित करेगा? इसका राज्यों के हितों एवं आकांक्षाओं के साथ-साथ राज्यों के
विकास पर किस प्रकार असर पड़ेगा? इन तमाम प्रश्नों के आलोक में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से सम्बद्ध विभिन्न
पहलुओं पर विस्तार से विचार करता यह आलेख। लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खण्डित तारतम्यता:
सन् 1952-67 के दौरान देश में लोकसभा और विभिन्न
विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ ही
होते रहे, पर बाद में गठबंधन सरकारों के गठन और उनके विघटन से पैदा हुए हालात में
लोकसभा और विधानसभाओं में चुनाव अलग-अलग होने लगे। 1967
ई. में चौथे आम चुनाव के बाद काँग्रेस से मोहभंग की पृष्ठभूमि में राज्यों में संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकार का गठन हुआ,
पर राजनीतिक अस्थिरता की नयी समस्या उभरकर
सामने आयी और इसकी पृष्ठभूमि में सन् 1971 तक आते-आते कई राज्यों में मध्यावधि चुनाव की आवश्यकता हुई। इसी प्रकार सन् 1969 में काँग्रेस के विभाजन के पश्चात् सन् 1971 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने चौथी लोकसभा को उसके कार्यकाल से एक वर्ष पहले ही भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा की, जिसका उद्देश्य
काँग्रेस में क्षत्रपों को बेअसर करना था। इस प्रकार पहली बार लोकसभा और
विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने का सिलसिला टूटा और
इसके बाद फिर कभी संसद और विधानसभा के चुनाव एक साथ नहीं हो सके।
उन्होंने सन् 1972 में अठारह
विधानसभाओं को भंग कर उनके मध्यावधि चुनाव कराए।
फिर आपातकाल के दौरान पाँचवीं लोकसभा का कार्यकाल 1975 में
एक वर्ष बढ़ाया गया। इसीलिये लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तारतम्यता टूटने के लिए
कुछ हद तक तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व अर्थात् श्री मति इंदिरा गाँधी को भी जिम्मेवार
माना जाना चाहिए।
इसके बाद, जब 1977 ई. में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में प्रथम
गैर-काँग्रेसी सरकार का गठन हुआ, तो उसने सन् 1978 में कई राज्यों की विधानसभाओं को उनके कार्यकाल के पहले ही इस आधार पर भंग किया कि जनता का
उसमें विश्वास नहीं रह गया है। सन् 1980 ई. में सत्ता में आने के बाद श्री मति गाँधी
ने इसी प्रक्रिया को दोहराया। बाद के वर्षों में दोनों स्तर के चुनावों के बीच
असमन्वय और राज्य चुनावों में बिखराव बढ़ता ही गया। इस प्रकार अनु. 356 के दुरूपयोग ने भी बार-बार चुनाव की
परिस्थितियाँ पैदा की।
इसके अलावा, राजनीतिक दलों की
संस्थागत और संगठनात्मक कमजोरियों ने भी चुनावी राजनीति पर उनकी पकड़ को
कमजोर किया जिसके परिणामस्वरूप चुनाव-परिणामों में
बिखराव आया और विधायिकाएँ एवं सरकारें अस्थिर हुर्इं। सन् 1989 के बाद केन्द्र में गठबंधन की राजनीति के इसी
दौर में सत्तारूढ़ दलों के द्वारा कानून-व्यवस्था या अस्थिरता का बहाना बना कर अनु.
356 का दुरूपयोग करते हुए विरोधी दल की राज्य सरकारों को कार्यकाल पूरा होने से
पहले बर्खास्त कर चुनाव करवाने की परिपाटी और भी तेज हो गयी। स्पष्ट है कि 1990 के दशक में
केंद्र में गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और इसके कारण 1989-1999 के दौरान होने वाले
पाँच लोकसभा चुनावों ने तो लय-ताल ही बिगाड़ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव
भारत में वार्षिक और वर्ष भर चलने वाले ‘कार्यक्रम प्रबंधन’ बन गए हैं। यदि हम सारे देश में स्थानीय निकायों के चुनावों को मिला लें,
तो परिदृश्य और भी बड़ा दिखता है।
भारतीय प्रधानमंत्री का प्रस्ताव:
सत्ता में आने
के बाद से ही केन्द्र में भारतीय प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर
रही है। उनकी इस कोशिश को सरकार के कुछ सहयोगी
दलों का भी समर्थन मिला। केन्द्र सरकार के इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते
हुए बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के वरिष्ठ सहयोगी दल जनता दल (यूनाइटेड) ने
कहा कि अगर केन्द्र की ओर से दिसंबर,2018 में लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव साथ कराने का प्रस्ताव आता है, तो
बिहार सरकार भी राज्य की विधानसभा भंग कर चुनाव में जाने को तैयार है। हाल में बिहार
चुनाव के ठीक पश्चात् एक बार फिर से भारतीय प्रधानमन्त्री ने ‘वन नेशन, वन
इलेक्शन’ का आह्वान किया है। ऐसा लग रहा है कि बिहार-चुनाव ने नकारात्मक मसलों को
पृष्ठभूमि में धकेलते हुए जिस तरीके से बेरोजगारी, विकास, मँहगाई और
कानून-व्यवस्था के सकारात्मक मसलों को राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में लाया है,
उसने आनेवाले समय में केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के समक्ष उत्पन्न होने वाली
चुनौतियों की ओर इशारा किया है। इसके मद्देनज़र सरकार राजनीतिक विमर्श के मसले को
बदलना चाहती है और इसी के आलोक में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का राग एक बार फिर से
छेड़ा गया है। इस बहाने भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार लोकसभा और विधानसभाओं
के चुनाव एक साथ कराने की योजना पर राष्ट्रीय सहमति बनाना चाहती है और इसके सहारे
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से क्षेत्रीय एवं स्थानीय दलों को ठिकाने लगना चाहती है
क्योंकि उसका अबतक का अनुभव यह बतलाता है कि जहाँ भी उसकी सीधी भिड़न्त काँग्रेस से
है, वह आसानी से अपनी चुनावी जीत को सुनिश्चित करने की स्थिति में है; लेकिन जहाँ
भी उसकी भिड़न्त क्षेत्रीय दलों से, उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और इस
क्रम में अक्सर उसे मुँहकी खानी पड़ी है। ध्यातव्य है कि इससे पूर्व सन् 1999
में विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट ने बहुग्राही तथा व्यापक
राजनीतिक, संस्थागत एवं चुनावी सुधारों की तथा ऐसी युक्तियों
की अनुशंसा की है जिससे ‘लोकसभा तथा सभी विधानसभाओं के चुनाव
साथ-साथ कराने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।’
नीति आयोग और चुनाव आयोग को अनुकूल
माहौल बनाने की जिम्मेवारी:
सरकार ने लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के विषय
पर जनमत तैयार करने का कठिन कार्य नीति आयोग को सौंपा गया है और सरकार की मंशा को देखते हुए ही नीति आयोग ने भी चुनाव
आयोग को इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। नीति आयोग और चुनाव आयोग
कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल को थोड़ा घटाकर या बढ़ाकर उनके चुनाव सन् 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ कराने के प्रश्न पर विचार
कर रहे हैं। इस संन्दर्भ में संसद की स्थायी समिति ने एकीकृत तरीके से चुनाव
कराने की सिफारिश करते हुए कहा है कि बार-बार
चुनाव होने से नीतियाँ प्रभावित होती हैं, सामान्य जनजीवन भी प्रभावित होता है और
जरूरी सेवाओं में बाधा उत्पन्न होती है। केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग को इसके लिए आवश्यक चीजों की उपलब्धता
सुनिश्चित कराने का आश्वासन दिया था, और उस समय चुनाव आयोग ने कहा था, “वह लोकसभा
और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम है, पर इसके लिए उसे ईवीएम खरीदने
के लिए करीब 12,000 करोड़ रुपये एवं वीवीपीएटी
मशीन के लिए 3,400 करोड़ रुपये उपलब्ध करा दिए गए हैं।”
अलग-अलग चुनाव के दुष्परिणाम:
परिणाम यह हुआ कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव के अलग-अलग समय पर
होने के कारण देश में हर साल कहीं-न-कहीं चुनाव होने लगे। इसके कारण ऐसा लगता है
कि देश चुनाव के दुष्चक्र में फँस गया है। इससे बाहर निकलने के लिए यह
सुझाव दिया जा रहा है कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ कराए जाएँ। दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन ऐसे कई देश हैं जहाँ केंद्रीय और
प्रांतीय चुनाव साथ-साथ होते हैं। इससे अंतहीन चुनाव का चक्र टूटेगा। पार्टियों और उम्मीदवारों के चुनावी खर्चो पर रोक लगेगी जिससे चुनावी
खर्चो में काफी कमी आएगी क्योंकि इससे लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उतरने वाले
प्रत्याशी अपने खर्च साझा कर सकेंगे और उन पर आर्थिक दबाव कम पड़ेगा। साथ ही,
शासनिक व्यवस्था पर आने वाला दबाव भी कम होगा। इसके पक्ष में निम्न तर्क दिए जाते
हैं:
1. नीतिगत निर्णयों और सरकार की क्रियाप्रणाली का प्रभावित होना: देश
में हर साल औसतन पाँच-से-छह राज्यों के विधानसभा चुनाव सम्पन्न होते हैं। इस दौरान
चुनावी आचार संहिता के लागू होने के कारण केन्द्र सरकार पर भी दबाव उत्पन्न होता
है और उसके लिए निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। परिणामतः आदर्श आचार संहिता
(Model Code of Conduct) के लागू होने के कारण ढेर सारी आवश्यक सरकारी नीतियों और
फैसले लेने में भी अनावश्यक विलंब होता है।
2. विकास-प्रक्रिया
का अवरूद्ध होना: चुनावी आचार संहिता के लागू होने की स्थिति में पूरा-का-पूरा प्रशासन ठप्प हो
जाता है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव का सञ्चालन प्रशासन की सर्वोच्च
प्राथमिकता होती है। न तो नीतिगत निर्णय लिए जा सकते हैं और न ही नयी
योजनाएँ एवं कार्यक्रम शुरू किये जा सकते हैं। फलतः विकास-प्रक्रिया अवरुद्ध
होती है और अन्ततः इसका खामियाजा आमलोगों को भुगतना पड़ता है।
3. शैक्षिक गतिविधियों का भी पूरी तरह से ठप्प पड़ जाना: चुनाव
की स्थिति में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के सञ्चालन की प्रक्रिया में पूरी-की-पूरी
शैक्षिक मशीनरी को झोंक दिया जाता है। मतदाता-सूची के पुनरीक्षण से लेकर मतदान एवं
मतगणना की प्रक्रिया को संपन्न करने में शिक्षकों की भूमिका अहम् एवं निर्णायक
होती है, इसलिए चुनाव के दौरान विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प हो
जाती है।
4. अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ: चुनाव, चाहे
लोकसभा के हों या विधानसभा के, को संपन्न कराने में बेहिसाब खर्च होते हैं और इसके
लिए न केवल चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने वाले राजनीतिक दलों एवं उनके
उम्मीदवारों को खर्च करनी होती है, वरन् सरकारी तंत्र और चुनाव आयोग को भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है। इसके लिए भारी मात्रा में
संसाधनों की ज़रुरत होती है जो अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक दबाव उत्पन्न करता है। यह
खर्च अपनी प्रकृति में अनुत्पादक किस्म का होता है। सेंटर
फॉर मीडिया स्टडीज(CMS) ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है, “सत्रहवीं लोकसभा के
लिए हुए चुनाव में प्रत्याशियों की ओर से करीब 60,000
करोड़ रुपये खर्च किये गए हैं और चुनाव आयोग ने भी इस रकम के करीब (15-20) प्रतिशत के बराबर राशि खर्च की है। ऐसे में सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव,2019
के दौरान करीब 70,000 करोड़ रुपये खर्च हुए
हैं।”
नीति आयोग के सुझाव:
नीति आयोग के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में ‘व नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव
को उचित ठहराने के लिए विधि-आयोग की 170वीं रिपोर्ट का हवाला दिया गया
है। इसके अनुसार:
1. दो चरणों में चुनाव का सुझाव: चूँकि संसदीय प्रणाली में विधायिका की कोई निश्चित नियत अवधि नहीं है, इसीलिए दोनों स्तरों के चुनावों को दो चरणों में समन्वित किया जा सकता है। पहला
चरण 2019 में सत्रहवें आम चुनाव के साथ तथा दूसरा 2021 में। सत्रहवीं लोकसभा के मध्य में कुछ विधानसभाओं की
अवधि को घटा कर तथा कुछ की अवधि को बढ़ा कर किया जा सकता है।
2. कार्यकाल के दौरान लोकसभा के भंग होने की स्थिति में: अगर लोकसभा अपनी अवधि से
पहले भंग हो जाती है, तो प्रस्तावित सुझाव निम्नलिखित है: यदि लोकसभा
का शेष कार्यकाल लम्बा नहीं (इसे स्पष्ट किया जाएगा) है, तो तत्काल चुनाव की बजाय यह
प्रावधान किया जा सकता है कि राष्ट्रपति तबतक एक
मंत्रिपरिषद नियुक्त कर देश का प्रशासन चलाएगा, जब तक की अगले सदन का गठन एक निर्धारित अवधि के अंदर नहीं हो जाता। राष्ट्रपति का केन्द्र में
शासन उपर्युक्त परामर्श का एक ऐसा अंग है जिसके लिए संवैधानिक परिवर्तन की
आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए इसे तार्किक आलोचनात्मक दृष्टि से देखना
आवश्यक है। इसे राजनीतिक और संस्थात्मक सुधारों के परिप्रेक्ष्य में भी देखना
जरूरी है।
3. संविधान सभा की बहस पर विचार अपेक्षित: यदि हम अवधि से पूर्व लोकसभा भंग होने की संभावना और उसकी अवधि छह
महीने से कम होने पर राष्ट्रपति के हाथों में बागडोर देने के सुझाव पर विचार करें, तो
यह आवश्यक है कि हम इस विषय पर सावधानीपूर्वक संविधान सभा में चली बहस पर भी नजर
डालें। इस बहस के दो हिस्से थे, दोनों का उद्देश्य नवजात गणतंत्र में राष्ट्रपति की स्थिति निर्धारित करना
था:
a. एक निर्वाचक मंडल द्वारा राष्ट्रपति के चुनाव को इसलिए प्रधानता दी गई कि राष्ट्रपति को ब्रिटिश महारानी/इंग्लैंड के सम्राट के
समकक्ष बनाने का निर्णय लिया गया था।
b. इसी प्रकार राष्ट्रपति की शक्तियों को निर्धारित करने वाली संविधान की धारा 54 को भी ब्रिटिश मंत्रिमंडलीय पद्धति में सम्राट के अनुरूप ढ़ालने
का प्रयास किया गया।
c. नीति आयोग द्वारा दिए गए सुझाव, कि भारत का
राष्ट्रपति अमेरिकी राष्ट्रपति की भाँति ‘चीफ एग्जीक्यूटिव’ की तरह कार्य करे, को संविधान सभा ने भारत के लिए उपयुक्त
नहीं समझा। यह सोचना कि एक छोटी अवधि के लिए भी यह इसलिए किया जा सकता है, क्योंकि चुनावों को साथ करवाया जा सके, अभिशासन के किसी भी
सिद्धांत के अनुरूप नहीं बैठता।
संसद की स्थाई समिति की
सिफारिश:
‘लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ
कराने की व्यवहार्यता’ पर रिपोर्ट देने वाली संसदीय स्थायी समिति के समक्ष आयोग ने
कठिनाइयों का जिक्र किया। चुनाव आयोग ने इस
प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन आयोग ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ
साथ कराने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें तथा वोटर
वेरिफियेबल पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) मशीनें मशीनें
खरीदने खरीदनी होंगी जिसके वास्ते करीब
सवा नौ हज़ार करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इसके अलावा ईवीएम एवं वीवीपीएटी मशीनों के रख-रखाव
और इसे हर 15 साल में बदलने के लिए भारी भरकम राशि खर्च होगी। काँग्रेस
के राज्यसभा सांसद ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली उक्त संसदीय समिति
ने अगले वर्ष सोलह विधानसभाओं तथा सन् 2019 में लोकसभा के साथ-साथ शेष बची पंद्रह
विधानसभाओं के चुनाव कराने का सुझाव दिया था। इसके अलावा, समिति ने किसी भी सूरत
में लोकसभा और विधानसभाओं को तय अवधि से पहले भंग न करने की सिफारिश की है।
इतना ही
नहीं, समिति ने उन तकनीकी एवं दिक्कतों की ओर भी
संकेत किया जो साथ-साथ चुनाव कराने पर आ सकती हैं। निर्वाचन-संबंधी
कानून के अनुसार, सदन
का कार्यकाल समाप्त होने से छह माह पूर्व चुनाव कराए जा सकते हैं और सदन का
कार्यकाल आपातकाल की अधिसूचना को छोड़ कर अन्य मामलों में नहीं बढ़ाया जा सकता। ऐसी
स्थिति में दो तरह की समस्याएँ आयेंगी:
a.
इसके लिए राजनीतिक सहमति बनानी
होगी, विशेष रूप से विपक्षी दल और विपक्षी दलों के द्वारा शासित राज्यों के
मुख्यामंत्रियों को विश्वास में लेना होगा, और
b.
इसके लिए संविधान में संशोधन की
जरूरत होगी।
इसके मद्देनज़र निम्न दिशा में
पहलों की आवश्यकता होगी:
1. राज्य विधानसभाओं के कार्यकालों में परिवर्तन: लोकसभा के कार्यकाल के अनुरूप लाने के लिए राज्य विधानसभाओं के सदनों में अवधि या तो बढ़ाई जा सकती है या घटाई जा सकती
है और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद तीन और चार में
संशोधन की जरूरत होगी।
2.
कार्यकाल न
पूरा करने की स्थिति में वैकल्पिक संभावनाओं पर विचार: एक साथ चुनाव करवा लेने के बावजूद भी समस्या समाप्त नहीं
होगी। इसके बावजूद भी ऐसी भी स्थिति आ सकती है जब राज्य में राष्ट्रपति-शासन लागू हो, या सरकारों के खिलाफ
अविश्वास प्रस्ताव पारित किया जाए, या फिर विश्वास प्रस्ताव खारिज हो जाए। इसलिए सरकार को इस प्रश्न
पर भी विचार करना होगा कि इस स्थिति से किस प्रकार निपटा जाए?
3. निर्धारित कार्यकाल को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल और इसके लिए
अनुकूल स्थितियों का निर्माण: एक साथ चुनाव के लिए ऐसी
स्थितियाँ बनानी होंगी कि निर्वाचित सदन पाँच साल का अपने कार्यकाल पूरा करें। इसके
लिए सदन को भंग करने, अविश्वास प्रस्ताव और चुनाव-पश्चात् त्रिशंकु विधानसभा की
स्थिति में भी सरकार के गठन से सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों को बदलना होगा जो मध्यावधि
चुनाव का मार्ग प्रशस्त करते हैं। चुनाव के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के गठबंधन
या उसके विघटन को अगर नियंत्रित नहीं किया गया, तो आगे उसी तरह की
कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसे एक बार की प्रक्रिया समझना भूल होगी। इसे
विश्वसनीय, सरल एवं दोषरहित बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था करनी
होगी कि लोकसभा और विधानसभायें हर सूरत में अपना कार्यकाल पूरा करें। पत्रकार प्राण
चोपड़ा ने सन् 1999 में यह परामर्श दिया था कि सरकार के खिलाफ
अविश्वास प्रस्ताव की सूरत में एक नए विकल्प में विश्वास
का प्रस्ताव अनिवार्य बनाया जाए, इससे मध्यावधि चुनाव
की संभावना समाप्त होगी। यदि राजनीतिक सुधार और दलीय व्यवस्था के संगठनात्मक पहलुओं
को इस सरकार ने मजबूत किया, तो लगातार चुनावों पर रोक लग सकती
है।
4. जर्मन अनुभव से सीख: ऐसी स्थिति से बचने के
लिए हम जर्मन संविधान की व्यवस्थाओं से सीख ले
सकते हैं। जर्मनी में ‘अविश्वास मत के प्रस्ताव’ के स्थान पर ‘रचनात्मक अविश्वास मत के प्रस्ताव’ का प्रावधान किया गया है। वहाँ आम चुनाव के बाद
जब सरकार गठित हो जाती है, तो वह तब तक काम करती है, जब तक कि किसी दूसरे वैकल्पिक सरकार की व्यवस्था नहीं हो जाती। मतलब यह कि
सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जाता है, बल्कि
किसी दूसरे नेता के नेतृत्व में नई सरकार के बहुमत का दावा पेश किया जाता है, जिससे एक सरकार गिरती है, तो उससे पहले दूसरी सरकार
बनने की स्थिति रहती है। ऐसी प्रणाली भारत में भी लागू की जा सकती है। इसमें
अविश्वास प्रस्ताव तभी आ पाएगा, जब कोई वैकल्पिक सरकार बनाने
का दावा हो। इससे लोकसभा एवं विधानसभा का पाँच साल तक चलते रहना निश्चित हो जाएगा।
5.
अपेक्षित
मात्रा में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता को सुनिश्चित करना: ईवीएम का निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों बीईएल और ईसीआईएल द्वारा
किया जाता है। इस बारे में भी विचार करना होगा
क्योंकि उन्हें नयी मशीनें बनाने के लिए समय की जरूरत होगी।
साथ-साथ चुनाव के नुकसान:
लेकिन, एक साथ चुनाव के केवल
फायदे-ही-फायदे नहीं हैं। इसके अपने नुकसान भी हैं, विशेषकर भारत जैसे देश में,
जहाँ पर्याप्त समाजिक-सांस्कृतिक वैविध्य है और जहाँ कि सामाजिक संरचनाओं में
विषमता कहीं गहरे स्टार पर मौजूद है। साथ ही, इसके रास्ते में कई व्यावहारिक
कठिनाइयाँ भी हैं,
जिन्हें निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1.
संसदीय लोकतंत्र में जनता
के प्रति जवाबदेही का कमजोर होना: अलग-अलग वक्त पर
होने वाले अलग-अलग चुनाव न केवल राज्य में सत्तारूढ़ दल और जन-प्रतिनिधियों
की जनता के प्रति, वरन् केंद्र में सत्तारूढ़ दलों की जवाबदेही भी तय करते हैं
क्योंकि समय-समय पर चुनाव के जरिये केंद्र सरकार को अपनी नीतियों के जनता पर
प्रभाव का संकेत देते हुए उसकी समीक्षा के लिए विवश करती है। एक साथ चुनाव की स्थिति
में पाँच साल के लिए जनता के प्रति किसी जवाबदेही से निश्चिंत हो जायेंगे और संभव है कि
नेतृत्व पर अंकुश न रह जाने के कारण सरकार निरंकुश हो जाए। ऐसी स्थिति में जनहित
को सुनिश्चित कर पाना मुश्किल हो जाएगा। वर्तमान स्थिति में सरकारें निरंकुश
होकर इसलिए नहीं काम कर पाती हैं कि उसे छोटे-छोटे अंतराल पर किसी-न-किसी चुनाव का
सामना करना पड़ता है।
2. क्षेत्रीय एजेंडे और क्षेत्रीय पार्टियों के लिए संकट: वर्तमान में लोकसभा चुनावों में सामान्यतः राष्ट्रीय
मुद्दे हावी रहते हैं, जबकि विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय मुद्दे।
लेकिन, एक साथ चुनाव की स्थिति में क्षेत्रीय मुद्दे हाशिए पर चले जायेंगे और इसका
प्रतिकूल असर क्षेत्रीय समावेशन एवं समावेशी विकास पर पड़ेगा। इसका सीधा लाभ राष्ट्रीय पार्टियों को मिलेगा और
कहीं-न-कहीं क्षेत्रीय पार्टियाँ प्रतिकूलतः प्रभावित होंगी क्योंकि इसमें क्षेत्रीय मुद्दों के लिए जगह बना पाना मुश्किल होगा। क्षेत्रीय दलों के
कमजोर पड़ने के कारण नई व्यवस्था में स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता मिलने की
संभावना कम हो जाएगी।
3. लेवल प्लेइंग फील्ड का प्रभावित होना: इतना
ही नहीं, एक साथ चुनाव होने की स्थिति में राष्ट्रीय पार्टियों के द्वारा अपना
चुनाव अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाएगा और इसके लिए उनके द्वारा अपने तमाम
संसाधनों झोंका जायेगा जिसकी बराबरी कर पाना क्षेत्रीय दलों के लिए संभव नहीं होगा।
साथ ही, ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय दलों के लिए
संसाधन जुटाना भी मुश्किल होगा।
यहाँ तक कि स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया के द्वारा
भी क्षेत्रीय दलों के बजाय राष्ट्रीय दलों को तवज्जो दिया जाएगा। इसके
परिणामस्वरूप राष्ट्रीय दल निर्णायक बढ़त की स्थिति में होंगे और क्षेत्रीय दलों के
लिए उनसे मुकाबला कर पाना मुश्किल होगा। इससे भारत जैसे विविधता से भरे समाज एवं
संस्कृति में राजनीतिक-लोकतान्त्रिक बहुलता
प्रतिकूलतः प्रभावित होगी। स्पष्ट है कि नई चुनावी व्यवस्था राष्ट्रीय
पार्टियों के लिए कहीं अधिक अनुकूल होगी और इसके कारण
क्षेत्रीय पार्टियों को न केवल मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, वरन् उन्हें
अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ेगा। स्पष्ट
है कि एक साथ चुनाव होने से स्थानीय, क्षेत्रीय
और छोटे दलों को नुकसान होगा। एक साथ
चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे हावी रहेंगे, स्थानीय एवं
क्षेत्रीय मसले गौण हो जायेंगे। हालाँकि कुछ
क्षेत्रीय दलों ने इस प्रस्ताव का समर्थन भी किया है।
4. व्यक्ति-केंद्रित राजनीति के जोर पकड़ने की आशंका: लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने
का एक नुकसान यह भी बताया जा रहा है कि चुनाव अभी से ज्यादा व्यक्ति-केंद्रित हो जाएँगे।
लोकसभा का चुनाव एक साथ होने की वजह से
राष्ट्रीय पार्टियाँ प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव में जा सकती
हैं और ऐसे में पूरा चुनावी अभियान उस व्यक्ति के आसपास केंद्रित रह सकता है। अभी
भी यह होता है. लेकिन अगर लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा के चुनाव भी होते हैं तो
इस तरह के चुनावी अभियान का असर विधानसभा चुनावों के मतदान पर भी पड़ेगा और इन चुनावों
में भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण व्यक्ति-केंद्रित हो सकता है। जानकारों के मुताबिक,
ऐसे में संभव है कि लोग जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाह रहे हों, उसी की पार्टी के पक्ष में वे विधानसभा चुनावों के लिए भी वोट कर दें।
5. त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में स्थिति का जटिल होना: लोकसभा
और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सबसे बड़ा पेंच यह है कि अगर किसी राज्य
में विधानसभा त्रिशंकु बनी, तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या उस राज्य
में फिर से चुनाव होगा; या फिर उस राज्य को अगले पाँच साल तक विधानसभा चुनाव के
लिए इंतजार करना पड़ेगा? कहा यह भी जा रहा है कि सभी विधानसभा चुनावों को ढ़ाई-ढ़ाई
साल के अंतराल पर दो हिस्से में बाँटा जाएगा। अगर ऐसा होता
है, तो त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में क्या उस राज्य को अगले ढाई साल तक
अगले विधानसभा चुनाव के लिए इंतजार करना पड़ेगा?
6.
वैकल्पिक व्यवस्था की
जटिलताएँ: ऊपर चर्चा के क्रम में जिन विकल्पों
का जिक्र किया गया है, उनमें से कोई भी विकल्प अपनाया गया, तो उसमें काफी
जटिलताएँ हैं और नई व्यवस्था मौजूदा व्यवस्था से कम-से-कम इस मोर्चे पर कम जटिल
नहीं होगी।
इन्हीं जटिलताओं का सामना तब भी करना पड़ेगा जब किसी राज्य की सरकार या केंद्र
सरकार अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले किसी राजनीतिक वजह से गिर जाए; ऐसी स्थिति
में क्या होगा, इस बारे में भी अभी स्पष्टता नहीं है।
विश्लेषण:
निष्कर्ष यह कि इस
मसले पर जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के पहले व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है।
साथ ही, इसके लिए सभी सम्बद्ध हित-समूहों को विश्वास में लिया जाना चाहिए और ऐसा
कुछ भी करने से परहेज किया जाना चाहिए जिससे राजनीतिक-लोकतान्त्रिक बहुलता
प्रतिकूलतः प्रभावित होती हो। भारतीय समाज और संस्कृति की विविधता के मद्देनजर यह
आवश्यक है। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि ऐसे किसी भी बदलाव से
परहेज़ किया जाए जिससे हाशिए पर के समूहों की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक समावेशन की
प्रक्रिया अवरुद्ध हो।
बेहतर आलेख सर।
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