सामाजिक न्याय की राजनीति: दशा एवं दिशा: 17वीं लोकसभा चुनाव
सामाजिक न्याय की राजनीति: दशा एवं दिशा
(सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव परिणाम के आलोक में)
प्रमुख आयाम
1. सामाजिक न्याय की राजनीति में बदलाव:
a. सत्रहवीं
लोकसभा-चुनाव और सामाजिक न्याय
b. मोहभंग
का शिकार सामाजिक न्याय आंदोलन
c. बदलाव की प्रक्रिया को नेतृत्व प्रदान करती भाजपा
d. सवर्णों
के राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना के संकेत
e. लोकसभा
से विधानसभा तक
f.
राजनीतिक समावेशन और सामाजिक न्याय के
दावों की असलियत
g. सवर्ण-उभार और मंत्री-परिषद की
सामाजिक संरचना
h. प्रोफेसर जिल्स वर्नियर का विश्लेषण
i.
भारत की सामाजिक संरचना कहीं
अधिक जिम्मेवार
j.
विश्लेषण
2.
सामाजिक न्याय की राजनीति और 17वीं लोकसभा चुनाव:
a.
अप्रासंगिक होती सामाजिक न्याय की राजनीति
b.
सामाजिक
न्याय की राजनीति 3.0
c.
सामाजिक न्याय और महिलाएँ
d.
सामाजिक न्याय और मुसलमान
e.
भविष्य
की संभावना:
सामाजिक न्याय
की राजनीति में बदलाव:
सन् 1990 में मंडल आन्दोलन के बाद राजनीतिक-सामाजिक समावेशन की
प्रक्रिया तेज हुई और इसके परिणामस्वरूप संसद में अन्य पिछड़े वर्गों(OBC’s) का
प्रतिनिधित्व 11 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत
के स्तर पर पहुँच गया क्योंकि इस दौर में राजद, जद(यू), सपा और बसपा ने भारत के दो
सबसे बड़े राज्यों की राजनीति को पूरी तरह से परिवर्तित कर डाला और स्थानीय राजनीति
में संतुलन को पिछड़ों के पक्ष में झुकाने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका
निभायी। यहाँ तक कि मौके की नजाकत को समझते हुए
सवर्णों के वर्चस्व वाली राजनीतिक शैली अपनाने वाली काँग्रेस और भाजपा को भी पिछड़ी
जातियों के लिए राजनीतिक स्पेस सृजित करने पड़े। लेकिन, 21वीं सदी के पहले दशक के
अंततक भाजपा की उग्र-हिंदुत्व की वह राजनीति व्यापक स्तर पर अपनी प्रभावी उपस्थिति
दिखने लगी जिसे उसने मंडलवादी राजनीति की काट में प्रस्तुत किया था और इसी की पृष्ठभूमि
में सवर्णों का राजनीति में दखल भी बढ़ने लगा।
सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव और सामाजिक न्याय:
सन् 2019
के सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव-परिणामों ने सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले राजनीतिक
दलों, विशेषकर उत्तर भारत में वंचित समूहों का नेतृत्व करने वाले राजनीतिक दलों को
गहरा झटका दिया है और इस झटके के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति के भविष्य पर भी
सवाल उठने लगे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में सामाजिक
न्याय की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल तो पहले से ही वहाँ के चुनावी राजनीतिक
परिदृश्य से लगभग गायब हैं, पर इस लोकसभा-चुनाव में उत्तर प्रदेश में असीम
संभावनाओं वाले सपा-बसपा महागठबंधन का महज़ 14
सीटों पर सिमट जाना और बिहार में राजद का सूपड़ा साफ होना इस ओर इशारा करता है कि
या तो सामाजिक न्याय की राजनीति अब प्रासंगिक नहीं रह गई है और अब इससे लोगों का
मोहभंग होने लगा है, या फिर इसे नेतृत्व प्रदान करने वाले राजनीतिक दलों एवं
नेताओं ने इसे उस मोड़ पर पहुँचा दिया है जहाँ से यह या तो समाप्त हो जायेगी, या
फिर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए इसे खुद को पुनर्परिभाषित करना होगा। इसका
संकेत पिछले लोकसभा-चुनाव के दौरान ही मिलने लगा था जब बिहार और उत्तर प्रदेश में
राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल(युनाइटेड), समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी का
लगभग सफ़ाया हो गया। पर, जब बिहार विधानसभा-चुनाव,2015 में
राजद, जद(यू) एवं काँग्रेस के महागठबंधन ने तमाम अनुमानों को झुठलाते हुए
ज़बर्दस्त चुनावी सफलता हासिल की, तब संकटग्रस्त सामाजिक न्याय की राजनीति को
पुनर्जीवन मिलता हुआ दिखाई पड़ा और उससे प्रेरणा ग्रहण करते हुए उत्तर प्रदेश में
सपा एवं बसपा ने भी चुनावी गठजोड़ की दिशा में पहल की; लेकिन इस लोकसभा-चुनाव में
यह प्रयोग भी बुरी तरह से पिट गया और सामाजिक न्याय की राजनीति अस्तित्व के संकट
से गुज़रती दिखाई पड़ रही है।
मोहभंग का शिकार सामाजिक न्याय आंदोलन:
लेकिन,
इसका मतलब यह नहीं कि सामाजिक अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध दम तोड़ रहा है। पिछले कुछ
वर्षों में दलित-आदिवासी-पिछड़ों के आंदोलन इस बात के गवाह हैं कि सामाजिक अन्याय
और उसके खिलाफ जनता के स्तर पर प्रतिरोध जारी है। हाँ, यह जरूर हुआ है कि सामाजिक
न्याय की रहनुमाई करने वाली पार्टियों में लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है जिसके
कारण आंदोलन की कमान नेताओं और राजनीतिक दलों से हाथ से निकलती हुई जनता के हाथ
में पहुँच गयी है। रोहित वेमुला एवं ऊना-प्रकरण से लेकर सहारनपुर आंदोलन एवं मार्च-अप्रैल
में भारत-बंद तक आंदोलनों का आयोजन राजनीतिक दलों के सहयोग के बिना हुआ। वर्तमान
में दलितों के पास अपने छोटे-छोटे सामाजिक संगठन तो हैं, लेकिन सामाजिक न्याय की
रहनुमाई करने वाली पार्टियाँ उनको प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें अपना
प्रतिद्वंद्वी समझकर रास्ते से हटाना चाहती हैं।
अब
सवाल यह उठता है कि यदि सामाजिक न्याय की राजनीति से मोहभंग की परिस्थितियाँ
निर्मित हो रही हैं, तो इसके कारण क्या हैं? इन कारणों को निम्न परिप्रेक्ष्य में
देखा जा सकता है:
1. परिवारवाद और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता सामाजिक न्याय आंदोलन: 1990
के दशक में उत्तर भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में क्रमशः
समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय जनता दल
(राजद) ने सवर्णों के वर्चस्व वाले पारम्परिक सामाजिक ढाँचे को गंभीर
चुनौती दी थी, लेकिन यह सामाजिक न्याय की लड़ाई को विस्तार एवं गहराई प्रदान करने
की बजाय परिवारवाद के चँगुल में उलझता दिखाई पड़ा। सामाजिक न्याय का मतलब न तो एक
ही जाति का वर्चस्व होता है और न ही एक ही परिवार का राज। कायदे से सामाजिक न्याय
की लड़ाई का प्रसार नए-नए नेताओं औऱ अलग-अलग जातियों में होना चाहिए था और उसके
ज़रिए नवीन नेतृत्व की संभावनाओं की पड़ताल की जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हो
सका।
2. सामाजिक आंदोलनों से दूरी: राजद हो या जनता
दल (यू), सपा हो या बसपा: इन सबकी सबसे बड़ी कमी यह है कि ये तमाम राजनितिक दल
सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति तो करती हैं, पर पर इनके सामाजिक न्याय का दायरा
जाति-विशेष तक सीमित है और इन तमाम राजनीतिक दलों की सामाजिक संघर्षों से दूरी लगातार
बढ़ती चली जा रही है। इनके लिए सामाजिक न्याय के मायने वोटबैंक की राजनीति तक सीमित
हैं।
3. योग्य एवं सक्षम नेतृत्व का अभाव: यद्यपि आंतरिक
लोकतंत्र का अभाव भारतीय राजनीतिक दलों की सार्वभौम समस्या है, पर बसपा के संदर्भ
में यह समस्या कहीं अधिक गहन है क्योंकि उसके पास ऐसे नेताओं की कमी है, जिनकी
राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हो और जो प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से
लेकर सोशल मीडिया तकपार्टी के पक्ष को रखते हुए इसके पक्ष में माहौल बना सकें और
जनमत को प्रभावित कर सकें। सपा और राजद जैसे राजनीतिक दलों के पास यदि योग्य एवं
सक्षम नेतृत्व मौजूद भी है, तो परिवारवाद एवं वंशवाद के आग्रह के कारण कभी उसे
उभरने के अवसर नहीं मिल पाते।
4. सामाजिक न्याय को व्यापक समाज के एजेंडे में तब्दील कर पाना: जिन
राजनीतिक दलों के द्वारा सामाजिक न्याय की राजनीति की जा रही है, वे अपने संकीर्ण
जातिगत आधार के दायरे से बाहर निकलकर सामाजिक न्याय को व्यापक समाज के एजेंडे में
तब्दील कर पाने में असफल रहे। जहाँ मायावती जी के नेतृत्व में बसपा का सामाजिक
आधार जाटवों तक सिमटता चला गया, और वह गैर-जाटव दलितों से कटती चली गयी, वहीं समाजवादी
पार्टी और राजद का सामाजिक आधार मुख्य रूप से यादवों एवं मुसलमानों तक सिमटा रहा
और इसने राजनीति में यादवों के वर्चस्व को सुनिश्चित करने का काम किया। इसकी यादववादी
छवि निर्मित हुई जिसने गैर-यादव पिछड़ों में यादवों के प्रति गहरे आक्रोश को जन्म
दिया और इसके कारण सामाजिक न्याय आंदोलन को नुकसान पहुँचा। और है। यद्यपि इन दोनों
दलों के नये नेतृत्व में नवीन संभावनाओं
की ओर इशारा किया है, पर नवीन नेतृत्व की अनुभवहीनता की क़ीमत इन दोनों दलों को
चुकानी पड़ रही है। भाजपा ने इनकी इन्हीं सीमाओं को भुनाते हुए नये सामाजिक समीकरण
गढ़ते हुए सवर्णों के राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया है।
5. आपसी सहयोग एवं समन्वय का अभाव: उत्तर प्रदेश
में सपा एवं बसपा, बिहार में राजद एवं जनता दल(यू), और लालू, मुलायम की राजनीतिक
महत्वाकांक्षाओं की टकराहट के साथ-साथ मुलायम, मायावती, नीतीश और रामविलास पासवान
की अवसरवादी राजनीति ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को कमजोर किया है क्योंकि इसके कारण
समान एजेंडे के बावजूद इनके बीच सहयोग एवं समन्वय संभव नहीं हो सका सामाजिक न्याय
को व्यापक समाज के एजेंडे में तब्दील कर पाने में असफल रहे। बिहार में महागठबंधन
ने मुनिया अर्थात् मुस्लिम, यादव एवं निषाद के जरिये माय-समीकरण को पुनर्परिभाषित
करते हुए सामाजिक न्याय के एजेंडे को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास तो किया, पर
समय एवं आपसी समझ के अभाव के कारण वह समीकरण जमीनी धरातल पर कहीं दिखाई नहीं पड़ा।
ऐसी ही स्थिति उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिली जहाँ ढ़ाई दशक के लम्बे संघर्ष के
बाद महागठबंधन में शामिल होने के बावजूद दलित और पिछड़े इतने कम समय में एक-दूसरे
पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हुए।
6. नेतृत्व का जन-अपेक्षाओं पर
खड़ा न उतरना: सामाजिक
न्याय की राजनीति करते हुए जो लोग आरक्षित सीटों से चुनकर सत्ता के गलियारों तक
पहुँचे, उन्होंने भी इसकी लड़ाई को आगे बढ़ाने की बजाय पार्टी हाईकमान के निर्देशों
को प्राथमिकता दी। आरक्षित सीटों से चुनकर आने वाले सांसद जिस तरह अक्षम साबित हो
रहे हैं, वह पूरे समाज के लिए निराशाजनक है। इतना ही नहीं, जिन लोगों ने स्वतंत्र
रूप से सामाजिक न्याय के सवालों को प्रभावशाली तरीकों से उठाया भी, वे अपनी ही
राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार हुए और राजनीतिक दलों के समक्ष समर्पण के लिए
विवश हुए। इन्होने खुद को इस्तेमाल होने दिया और इसकी कीमत सामाजिक न्याय के
एजेंडे को चुकानी पड़ी। उदाहरण के रूप में राम विलास पासवान को देखा जा सकता है जो
पिछले ढ़ाई दशकों के दौरान लगातार केंद्र में मंत्री बने रहे हैं, अब सरकारें चाहे
जिस दल या गठबंधन की हो। लेकिन, उनके पास सामाजिक न्याय एजेंडे के सन्दर्भ में
उपलब्धि के नाम खाली झोला के सिवा कुछ नहीं है।
बदलाव की प्रक्रिया
को नेतृत्व प्रदान करती भाजपा:
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सन्
2014 में सोलहवीं लोकसभा-चुनाव के दौरान भाजपा ने एक ओर बड़ी चालाकी से
उग्र-हिंदुत्व की राजनीति को राष्ट्रवादी एजेंडे से सम्बद्ध किया, दूसरी ओर सामाजिक
न्याय की मंडलवादी राजनीति के ठहराव एवं अंतर्विरोधों को अपने पक्ष में भुनाने की
हर संभव कोशिश की। दरअसल इन दो दशकों के दौरान सामाजिक न्याय की राजनीति ने खुद को
धर्मनिरपेक्ष एजेंडे से सम्बद्ध करते हुए खुद को भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के
विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन इसी दौरान सामाजिक न्याय की राजनीति जाति
विशेष के राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने के साधन में तब्दील होने लगी जिसके कारण
अन्य शोषित-उत्पीड़ित एवं वंचित जातियाँ खुद को ठगा एवं छला हुआ महसूस करने लगी।
बिना सामाजिक न्याय की राजनीति को पुनर्परिभाषित किये इनकी राजनीतिक
महत्वाकांक्षाओं का समायोजन संभव नहीं था और इसके लिए सामाजिक न्याय की रहनुमाई
करने वाले तैयार नहीं थे। स्वाभाविक था कि इसके कारण सामाजिक न्याय की राजनीति से
वंचित समुदाय का मोहभंग हो। मोहभंग की इस प्रक्रिया को इस बात से भी बल मिला जब
उन्होंने देखा कि सामाजिक न्याय की धर्मनिरपेक्ष राजनीति एक ओर वंशवाद, परिवारवाद
और भ्रष्टाचार की गिरफ्त में बुरी तरह से फँसता हुआ विकास के एजेंडे की अनदेखी कर
रही है, दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता मुस्लिम-तुष्टिकरण के पर्याय में तब्दील होती जा
रही है। इतना ही नहीं, चूँकि सामाजिक न्याय की राजनीति ने न केवल सवर्णों की
उपेक्षा की, वरन् प्रतिक्रियावाद के धरातल पर खड़ा होकर सामाजिक अन्याय का आधार
तैयार किया, इसीलिए स्वाभाविक था कि सवर्णों को इसके विकल्प की तलाश होती और यह
तलाश भाजपा के माध्यम से पूरी होती दिखाई पड़ी। स्पष्ट है कि सन् 2014 में भाजपा ने
इसी से उपजे असंतोष को अपने पक्ष में भुनाते हुए मंडलवादी राजनीति को
पुनार्परिभाषित करने का काम भी किया और उसे अप्रासंगिक बनाने का काम भी। यदि
सोलहवीं लोकसभा के नतीजे इस ओर इशारा करते हैं, तो सत्रहवीं लोकसभा के नतीजे 2014
के चुनाव-परिणामों पर मुहर लगाते हुए आते हैं।
सवर्णों के राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना के संकेत:
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें एक ओर भाजपा ने चुनावों में बड़ी संख्या में
सवर्ण उम्मीदवारों को उतारना शुरू किया, दूसरी ओर उन मुखर राजनीतिक समूहों के लिए भी
स्पेस सृजित किया जो सामाजिक न्याय की राजनीति में यादवों, कुर्मियों, जाटवों एवं
पासवानों के वर्चस्व से आहत थे और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करना चाहते
थे। इसीलिए मंडल-दौर के बाद मंदिर, उग्र-हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के आधार पर की
जाने वाली राजनीति के दौर में सवर्णों ने राजनीतिक बदलावों की प्रक्रिया को
नेतृत्व प्रदान करते हुए अपने राजनीतिक वर्चस्व को पुनर्स्थापित करने का आधार
तैयार किया और इसी के कारण राजनीतिक दलों ने भी सवर्णों को हाथों-हाथ लिया। इसे
निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1. संसद में सवर्णों का बढ़ता प्रतिनिधित्व: इस प्रक्रिया को सबसे ज्यादा
सवर्ण जाति के नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाते हुए भाजपा ने नेतृत्व प्रदान किया
है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि सन् 2019 में
हिंदी-पट्टी के 199 संसदीय सीटों पर भाजपा ने 88 सवर्णों को मैदान में उतारा जिनमें 80 सवर्ण सांसद
के रूप में निर्वाचित हुए। सन् 2004 में संसद में सवर्ण सांसदों
की संख्या 32-33 प्रतिशत के स्तर पर थी जो सन् 2014 में बढ़कर 42 प्रतिशत हो गयी। सन् 2019 में संपन्न
लोकसभा-चुनाव में भी ये बड़ी संख्या में जीतकर संसद पहुँचे हैं। लेकिन, भाजपा के हिंदी पट्टी के 199 उम्मीदवारों में 37
ब्राह्मण एवं 30 राजपूत थे, जबकि सन् 2014 में 33 ब्राह्मण
और 27 राजपूत सांसद चुने गए थे।
2. सवर्णों में भी राजपूतों का बढ़ता वर्चस्व: योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बनाने के बाद से राजपूतों
के राजनीतिक वर्चस्व में एक बार से वृद्धि के रुझान मिलते हैं और इस क्रम में
राजपूत वोटरों का भाजपा की ओर रुझान तेज हुआ है। दिसम्बर,2018 में चुनाव के पहले
हिन्दी-बेल्ट में भाजपा के जो सात मुख्यमंत्री थे, उनमें से पाँच राजपूत समुदाय से
आते थे। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि न केवल भाजपा में सवर्णों, वरन्
सवर्णों में भी ठाकुरों का राजनीतिक वर्चस्व है। इसके कारण न केवल भाजपा के गैर-सवर्ण सहयोगियों में, वरन् भाजपा-समर्थक
ब्राह्मणों में भी असंतोष एवं नाराज़गी को तेजी से बढ़ावा मिला।
3. पिछड़ों के प्रतिनिधित्व में गिरावट: इसी के सापेक्ष चूँकि भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ों को बेहतर प्रतिनिधित्व देकर
पिछड़े वोटों के बिखराव का आधार तैयार किया जिसकी परिणति पिछड़ी जाति के यादव
उम्मीदवारों की हार के रूप में हुई। इसके परिणामस्वरूप सन् (2009-19) के दौरान संसद में पिछड़ी
जाति का प्रतिनिधित्व 29 प्रतिशत से कम होकर 16 प्रतिशत के स्तर पर आ गया।
स्पष्ट है कि हिंदी-पट्टी में पिछले एक दशक के दौरान हिन्दी-पट्टी से
निर्वाचित होने वाले सांसदों में सवर्णों का दबदबा तेजी से बढ़ा है। ऐसा माना जा
रहा है कि उत्तर भारत में पारंपरिक रूप से अभिजात समूह के प्रति भाजपा के इस झुकाव
और इसके कारण इस समूह के द्वारा भाजपा के खुलकर समर्थन ने भाजपा के इस राजनीतिक
उभर को संभव बनाने में अहम् एवं निर्णायक भूमिका निभायी।
संसद की बदलती सामाजिक
संरचना
राष्ट्रीय दलों एवं
सवर्णों के टूटते वर्चस्व के बीच क्षेत्रीय दलों एवं पिछड़ों की महत्वपूर्ण होती
भूमिका(1990-2009):
मंडल आयोग की सिफ़ारिशों की वजह से
देश की राजनीति बदली,
संसदीय एवं
प्रांतीय राजनीति में सवर्णों का वर्चस्व टूटा और इसके सापेक्ष अन्य पिछड़ी
जातियों(OBC) का वर्चस्व बढ़ा तथा उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले दलों की
अहमियत बढ़ी। इस वजह से राजनीति के सामाजिक समीकरण बदले, मंडल आन्दोलन के साथ
राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में काँग्रेस का अवसान हुआ और इसके द्वारा सृजित
शून्य को भरने का काम मण्डल-रथ पर स्वर स्थानीय एवं क्षेत्रीय दलों ने किया। इस
क्रम में भारतीय राजनीति में न केवल क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती चली
गयी, वरन् संसद की सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आया:
1. ओबीसी सांसदों के
प्रतिनिधित्व में वृद्धि(11%-26%): इस क्रम में सन् (1989-2004) के
दौरान ओबीसी सांसदों की संख्या 11 प्रतिशत से बढ़
कर 26 प्रतिशत हो गई।
2. सवर्ण सांसदों के
प्रतिनिधित्व में कमी(49%-34%): इसी क्रम में सवर्ण सांसदों की तादाद सन् 1984 में 49
प्रतिशत से गिर
कर सन् 2004 में सिर्फ़ 34 प्रतिशत रह गयी।
पंद्रहवीं लोकसभा का
चुनाव निर्णायक मोड़:
1. क्षेत्रीय दलों एवं अवर्णों के
राजनीतिक वर्चस्व में कमी
2. राष्ट्रीय दलों एवं सवर्णों की
महत्वपूर्ण होती भूमिका (सन् 2009 से अबतक):
पिछले तीन दशकों के संसदीय इतिहास
में सन् 2009 में गठित पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ है जहाँ से
राष्ट्रीय दलों के प्रदर्शन में सुधर के रुझान देखने को मिलते हैं, और इसी के
सापेक्ष क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन में गिरावट की प्रक्रिया शुरू होती है। साथ
ही, इसी पृष्ठभूमि में संसद की सामाजिक संरचना में बदलाव की प्रक्रिया एक बार फिर
से तेज होती है:
1. पंद्रहवीं लोकसभा,2009
में:
a. जहाँ सवर्ण सांसदों की तादाद एक बार
फिर से बढ़कर 43
प्रतिशत के
स्तर पर पहुँच गयी, और
b. इसी के सापेक्ष ओबीसी सांसदों की
संख्या गिर कर 18 प्रतिशत
रह गई।
2. सोलहवीं लोकसभा,2014
के दौरान:
a. सवर्णों का प्रतिनिधित्व बढ़कर 44.5 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच गया हो गया, जबकि
b. ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व 20 प्रतिशत पर रुका रहा।
3. सत्रहवीं लोकसभा के
लिए:
a. कुल 542 नवनिर्वाचित सांसदों में 232 सवर्ण (42.8 प्रतिशत) हैं, जबकि
b. ओबीसी सदस्यों की तादाद 120 (लगभग 22 प्रतिशत) है।
c. अनुसूचित जाति के 86 और अनुसूचित जनजाति के 52 सांसद इस बार लोकसभा में हैं।
मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने
के बाद जो भारतीय राजनीति का व्याकरण बदला, उसके बाद यह एक तरह का यू-टर्न
है। इन बदलावों पर अगर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें, तो:
1. ब्राह्मण लाभान्वित: संसद में सवर्णों की भागीदारी में
वृद्धि का सबसे ज्यादा लाभ ब्राह्मणों को मिला। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव के बाद हालिया
चुनाव के बाद संसद में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व 9 प्रतिशत से बढ़ कर 17 प्रतिशत हो गया और वे हिन्दी भाषी इलाक़ों
में राजपूतों के बराबर आ गए।
2. यादव घाटे में: ओबीसी की भागीदारी में कमी की कीमत
यादवों को चुकानी पड़ी। यादवों का प्रतिनिधित्व 11 प्रतिशत से घट कर 6 प्रतिशत पर आ गया और वे इस मामले में जाटों
से भी पिछड़ गए, जिनकी संख्या 7.5 प्रतिशत है। लेकिन, राष्ट्रीय रुझानों के
विपरीत बिहार में ओबीसी का राजनीतिक वर्चस्व बचा हुआ है और इस बार निर्वाचित
बिहारी सांसदों में 30
प्रतिशत ओबीसी
हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा की
हिन्दुत्व-आधारित राष्ट्रवादी राजनीति के कारण हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और
इस ध्रुवीकरण ने सामाजिक न्याय की राजनीति करने वालों की निर्णायक हार को
सुनिश्चित किया। मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद पहली बार सवर्णों के
बीच मज़बूत जनाधार वाले राजनीतिक दल एवं उसके सहयोगियों की जीत हुई और पिछड़ों की
बात करने वाली पार्टी अपने ही इलाक़े में बुरी तरह हारी है।
लोकसभा से विधानसभा तक:
स्पष्ट है कि राजनीति में बीजेपी के उभार ने
सवर्णों के राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया है। यह
स्थिति उत्तर भारत के हिन्दी बेल्ट में कहीं अधिक प्रभावी है जहाँ सवर्णों का राजनीतिक
प्रतिनिधित्व सन् 2004 के 32.4 प्रतिशत से बढ़कर सन् 2014 में 42.7 प्रतिशत हो गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व 2012 के 32.7 प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 44.4
प्रतिशत हो गया। सन्
2014 के विधानसभा-चुनाव के बाद हरियाणा विधानसभा में जाटों एवं सवर्णों का प्रतिनिधित्व 52 प्रतिशत से
बढ़कर 62 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह वर्तमान असम विधानसभा में भाजपा विधायकों में सवर्णों का
प्रतिनिधित्व 47 प्रतिशत के स्तर पर है, जबकि कुल विधायकों में सवर्णों का
प्रतिनिधित्व महज 33 प्रतिशत के स्तर पर है। ग़ैर-भाजपा शासित राज्य की स्थिति भी
इससे बहुत अलग नहीं है। वर्तमान बिहार विधानसभा में बीजेपी के 54 फीसदी विधायक सवर्ण हैं,
जबकि पूरी विधानसभा में सवर्णों का प्रतिनिधित्व 21 प्रतिशत है। सत्रहवीं लोकसभा
चुनाव के दौरान भी बिहार से भाजपा के जो सत्रह सांसद निर्वाचित हुए हैं, उनमें
करीब 52 प्रतिशत सांसद सवर्ण हैं। इसी प्रकार राजस्थान विधानसभा में 57.6 प्रतिशत भाजपा विधायक प्रभु-जातियों
के हैं, जबकि कुल विधायकों में इनका अनुपात 53.7 प्रतिशत है; और मध्य प्रदेश विधानसभा में भाजपा विधायकों में प्रभु जातियों का
प्रतिनिधित्व 53 प्रतिशत के स्तर पर है, जबकि वहाँ की विधानसभा में इनका
प्रतिनिधित्व 47 प्रतिशत है। गुजरात
विधानसभा में 51 प्रतिशत भाजपा विधायक या
तो पाटीदार हैं या फिर सवर्ण, जबकि काँग्रेस के 34.6 विधायक। सन् 2018 में कर्नाटक विधानसभा में
लिंगायतों का प्रतिनिधित्व 24 प्रतिशत से
बढ़कर 28 प्रतिशत हो गया और इनमें 65 प्रतिशत लिंगायत विधायक भाजपा से आते हैं। पिछले तीन दशकों के दौरान बस फ़र्क़ यह आया है
कि जहाँ सवर्ण पारंपरिक कुलीन हैं, वहाँ इनका वर्चस्व है; और जहाँ ओबीसी एवं अन्य
जातियाँ पारंपरिक कुलीन हैं, वहाँ बीजेपी ने उन्हें भी प्रतिनिधित्व दिया है।
राजनीतिक समावेशन और सामाजिक न्याय के दावों की असलियत:
भाजपा भले कहती है कि वह उन जातियों को प्रतिनिधित्व देती है जिन्हें
सपा बसपा या अन्य दलों में प्रतिनिधित्व नहीं मिला, मगर आँकड़े कुछ और कहते हैं।
सन् 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा-चुनावों
में बीजेपी ने टिकटों के बँटवारे में 48.2 प्रतिशत टिकट सवर्णों को दिया, और ओबीसी
और जाट उम्मीदवारों को 31.2 प्रतिशत. इस 31.2 प्रतिशत में से दो तिहाई जाट, यादव,
कुर्मी और गुर्जर को दिया. बाकी हिस्से में निषाद, राजभर, कुशवाहा, लोध जैसी
जातियों को टिकट मिला। यही स्थिति नन-जाटव दलितों के सन्दर्भ में दिखाई पड़ती है,
जिसका सांकेतिक महत्व है, उससे अधिक नहीं। काँग्रेस ने 35 प्रतिशत टिकट सवर्णों को
दिया था। काँग्रेस में भी इसी तरह का ट्रेंड दिखेगा। कहीं ब्राह्मण छाया हुआ है,
तो कहीं ठाकुर। स्पष्ट है कि ओबीसी और दलित राजनीति के उभार से राजनीति में सवर्णों
का प्रभुत्व घटा था, लेकिन भाजपा के इस फार्मूले से उनकी वापसी हुई है।
सवर्ण-उभार और मंत्री-परिषद की सामाजिक संरचना:
इसकी पुष्टि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(NDA) सरकार 3.0 में विभिन्न
सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व से भी होती है। नवगठित 58 सदस्यीय
मंत्रीमंडल में सवर्णों को 55 प्रतिशत (32 सवर्ण) प्रतिनिधित्व मिला है, जबकि
पिछड़ी जाति को 22.4 प्रतिशत (13 पिछड़े), अनुसूचित
जाति को लगभग 10 प्रतिशत (6 मंत्री), और अनुसूचित जनजाति को 6.9 प्रतिशत (4 मंत्री)
प्रतिनिधित्व। सवर्णों में नौ ब्राह्मण नेताओं को कैबिनेट रैंक का दर्जा देकर इस
जाति के लोगों को संदेश देने की कोशिश की गई है, क्योंकि ब्राह्मण समुदाय अपनी
उपेक्षा और राजपूतों को विशेष तवज्जो मिलने से नाराज़ बतलाया जा रहा था।
अल्पसंख्यकों में सिख समुदाय के दो सदस्यों को और मुस्लिम समुदाय के एक सदस्य को
प्रतिनिधित्व दिया गया है। स्पष्ट है कि मंत्री-परिषद
में साफ़ तौर पर सवर्ण जातियों का दबदबा है, लेकिन
जातिगत समीकरण बनाने की कोशिश भी की गई है। झारखंड के नेता अर्जुन मुंडा को
कैबिनेट मंत्री बनाकर जनजाति समुदाय को साधने की कोशिश की गई है। मंत्री-परिषद में
बिहार से छह सांसदों को शामिल किया गया जिनमें चार मंत्री सवर्ण समुदाय से आते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि ग़ैर-यादव पिछड़ी जाति से या अति-पिछड़ी जाति से एक भी संसद
को जगह नहीं मिली है। सवर्णों के वर्चस्व का
अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दिसम्बर,2018 में चुनाव के पहले हिन्दी-बेल्ट में
भाजपा के जो सात मुख्यमंत्री थे, उनमें से पाँच राजपूत समुदाय से आते थे। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि न केवल भाजपा में सवर्णों, वरन्
सवर्णों में भी ठाकुरों का वर्चस्व है। इसके कारण न
केवल भाजपा के गैर-सवर्ण सहयोगियों में, वरन् भाजपा-समर्थक ब्राह्मणों में भी
असंतोष एवं नाराज़गी को तेजी से बढ़ावा मिला।
प्रोफेसर जिल्स वर्नियर का
विश्लेषण:
भारतीय
राजनीति में, और विशेष रूप से काँग्रेस एवं भाजपा की राजनीति में पारंपरिक कुलीन वर्गों,
जिसके केन्द्र में सवर्ण जातियाँ मौजूद हैं, का वर्चस्व है और इस वर्चस्व ने
संसाधनों पर उसके नियंत्रण को और दृढ़तापूर्वक स्थापित किया है। लेकिन,
मंडल-आंदोलन की पृष्ठभूमि में इसे पिछड़ी जातियों के लिए स्पेस सृजित करना पड़ा
जिसके कारण इसका राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व कमजोर पड़ा। लेकिन,
भाजपा के राजनीतिक उभार ने इस वर्ग को एक बार फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करते हुए
अपने राजनीतिक वर्चस्व पुनर्स्थापित करने का अवसर प्रदान किया। अशोका यूनिवर्सिटी
के असिस्टेंट प्रोफेसर जिल्स वर्नियर ने इंडिया
टुडे की वेबसाइट पर लिखे रिसर्चनुमा लेख ‘द रिटर्न ऑफ़ ठाकुरवाद’ में इस दिशा में
संकेत किया है और बतलाया है कि इस उभार ने किस प्रकार एक बार फिर से संसाधनों पर
उनके नियंत्रण को मज़बूत किया है। यही वो कुलीन
वर्ग है जो अपने राजनीतिक हितों के मद्देनजर एक दल से दूसरे दल में जाकर संसाधनों
पर अपने नियंत्रण को बनाए रखने की कोशिश करता है और इसीलिए इसकी राजनीतिक
प्रतिबद्धता इसके सामाजिक-आर्थिक हितों के अनुरूप संचालित होती है। पहले
कांग्रेस उसकी पहली पसंद थी और अब बीजेपी। अपने
संसाधनों की बदौलत ये विभिन्न तरीकों से स्थानीय स्तर पर अपनी छवि निर्मित करते
हैं और फिर अपनी इस छवि का इस्तेमाल अपने लिए विभिन्न राजनीतिक दलों से उम्मीदवारी
सुनिश्चित करने के लिए करते हैं। काँग्रेस और
बीजेपी इन पारंपरिक कुलीनों का इस्तेमाल करती हुई सत्ता हासिल करती है और फिर
इन्हें अपने वैध-अवैध हितों को पूरा करने की छूट देती है। जबतक इनके
हित पूरे होते हैं, तबतक ये उस दल के साथ खड़े होते; और जैसे ही उस दल से इनके हित
सधते हुए नहीं दिखाई पड़ते हैं, ये उस नए दल की ओर मुखातिब होते हैं जिसके साथ इनके
हित संरक्षित होते दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है
कि उम्मीदवारों की अहमियत समाप्त होती चली गई, और जनता को भी यह कहने से गुरेज़ नहीं
होता है कि हमें उम्मीदवार से मतलब नहीं है, मोदी के चेहरे से मतलब है।
भारत की सामाजिक संरचना कहीं
अधिक जिम्मेवार:
इस स्थिति के लिए अकेले
भाजपा जिम्मेवार नहीं है। काँग्रेस भी
कमोबेश इसी स्थिति में हैं। पारंपरिक अभिजात समूह, जिसमें सवर्णों के अलावा कुछ प्रभु मध्यवर्ती
जातियाँ भी आती हैं, समूह हिन्दी-बेल्ट में हमेशा से अति-प्रतिनिधित्व की स्थिति
में रहा है। विशेष रूप से पश्चिमी भारत,
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में भी यही स्थिति देखने को मिलती हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति(TRS) हो या तेलगू देशम, वायएसआर काँग्रेस हो या
जनता दल(सेक्युलर), इन सारे स्थानीय एवं क्षेत्रीय दलों में स्थानीय स्तर पर
प्रभावशाली रेड्डी, कम्मा, या वोकालिंगा मज़बूत एवं प्रभावी स्थिति में हैं। इसी प्रकार महारष्ट्र में मराठों का प्रतिनिधित्व हमेशा से (40-45)
प्रतिशत के बीच बना रहा है और वहाँ के सभी राजनीतिक दलों में यह स्थिति देखने को
मिलती है। लेकिन, यह ज़रूर है कि भाजपा
की चुनावी सफलता ने सभी राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ाया है और वे सवर्णों के अति-प्रतिनिधित्व
पर आधारित राजनीतिक समीकरणों के जरिये चुनावी सफलता हासिल करने की दिशा में पहल
करते दिखाई पड़े।
विश्लेषण:
स्पष्ट है कि पिछड़ी जाति के नेता के तौर पर
प्रधानमंत्री मोदी के उभार का लाभ इस पारंपरिक कुलीन को मिला है जो हिन्दी-भाषी
राज्यों में प्रमुख रूप से सवर्ण है जिसने धर्म एवं राष्ट्रवाद के नाम पर पिछड़ी
एवं दलित जातियों को पृष्ठभूमि में धकेलते हुए अपने जातिगत वर्चस्व को एक बार फिर
से स्थापित करने की कोशिश की। अबतक उसका जातिगत आक्रोश समय-असमय
प्रकट होता रहा, लेकिन अब उसे इसकी आवश्यकता महसूस नहीं होती है क्योंकि उसने
हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के मसले
पर पिछड़ों एवं दलितों को डाइवर्ट करने की तकनीक खोज निकाली है। वर्नियर ने बताया है कि इस पूरी
प्रक्रिया में संख्या-बल की दृष्टि से कमजोर पड़ने वाली जातियों के प्रतिनिधित्व में
कमी आयी है। इनकी मदद से
लंबे समय तक यादवों एवं जाटवों ने वर्चस्व कायम किया और अब इनकी मदद से ही फिर से
पारंपरिक कुलीनों एवं विशेष रूप से सवर्णों ने एक बार फिर से अपने वर्चस्व को
स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसका परिणाम यह है कि सभी राजनीतिक दलों में समर्थकों एवं
कार्यकर्ताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है और उन्हें हाशिये पर पहुँचाया जा रहा
है। यही कारण है कि
राजनीति में नए नेतृत्व के उभर की प्रक्रिया बाधित हो रही है। वर्नियर का कहना है कि हर राजनीतिक दल इसी
सीमित पारंपरिक कुलीन समूह से अपने उम्मीदवारों का चयन करता है और इसीलिए अंततः
जीत इसी पारंपरिक कुलीन वर्ग की होती है।
सामाजिक न्याय की
राजनीति और 17वीं लोकसभा चुनाव
अप्रासंगिक
होती सामाजिक न्याय की राजनीति:
दरअसल
सन् 1990 के दशक में मंडल की राजनीति की काट में लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में
भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाया जिसे मंडलवादी राजनीति के कारण हाशिये
पर पहुँचते सवर्णों ने हाथों-हाथ लिया। जैसे-जैसे काँग्रेस कमजोर होती चली
गयी, सवर्णों का भाजपा की ओर रुझान बढ़ता चला गया। फिर भी, पिछले ढ़ाई दशकों की भारतीय राजनीति में मंडलवाद ने मंदिर
एवं उग्र हिंदुत्व की राजनीति को हाशिये पर रखने में बहुत हद तक सफल रही, जिसका
कारण यह था कि भाजपा की छवि लम्बे समय तक ब्राह्मण-बनिए की पार्टी वाली बनी रही। तमाम कोशिशों के बावजूद इस छवि को तोड़ पाने और उससे
बाहर निकल पाने में भाजपा को सफलता नहीं मिल पायी, पर लोकसभा-चुनाव,2019 में अंतिम
रूप से मंडल बनाम् मंदिर की राजनीति मंदिर के पक्ष में तार्किक परिणति तक पहुँचती दिखायी
पड़ रही है; या फिर यह कहना कहीं
अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है कि मंडल की राजनीति को मंदिर की राजनीति के सहायक एवं
पूरक के रूप में तब्दील करने की जो प्रक्रिया सन् 1998 में शुरू हुई और जो
प्रक्रिया सन् 2014 में तेज हुई, वह सन् 2019 में तार्किक परिणति तक पहुँचती दिखाई
पड़ रही है।
सामाजिक न्याय की राजनीति 3.0:
दरअसल
2019 के चुनावों में हिंदुत्व की राजनीति ने मंडलवादी जातिगत राजनीति को न केवल
अपने पक्ष में पुनर्परिभाषित किया, वरन् उसमें दरार उत्पन्न करते हुए जातिगत
राजनीति करने वाले अपने विरोधियों को हाशिये पर पहुँचाने का काम भी किया। भाजपा ने बड़ी चालाकी से एक ओर उग्र हिंदुत्व पर
आधारित अपनी राजनीति और उसमें राष्ट्रवाद की छौंक के सहारे जातिगत राजनीति के
अभेद्य किले में सेंध लगाई, वरन् गैर-यादव पिछड़ों एवं गैर-जाटव दलितों को बेहतर
भागीदारी प्रदान करते हुए उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को तुष्ट करते हुए मंडलवादी
राजनीति को अपने पक्ष में पुनर्परिभाषित भी किया। बिहार में
भाजपा ने यह काम सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रबल पैरोकार और सामाजिक न्याय 2.0
के प्रतीक नीतीश कुमार एवं दलित-राजनीति के लोकप्रिय चेहरे राम विलास पासवान के
सहारे किया, तो उत्तर प्रदेश में इसने मुलायम सिंह यादव की पिछड़ों की राजनीति की
पोल खोलते हुए यह साबित कर दिया कि यह यादवों तक सीमित है, और यही काम उसने मायावती
की दलित-राजनीति के पर्दाफाश के जरिये किया जो जाटवों तक सीमित थी। इसी की बदौलत
सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने दुर्ग को ढ़हने से कुछ
हद तक बचाने में सफलता हासिल की और बिहार में अपने प्रदर्शन को सुधारते हुए उत्तर
प्रदेश में होने वाले नुकसान की भरपाई की। इस प्रकार उसने सन् 2014 की अपनी सफलता
को न केवल दोहराया, वरन् उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों ही जगहों पर महागठबंधन की
राजनीति के साथ-साथ मुस्लिम-यादव समीकरण एवं दलित-मुस्लिम समीकरण को निर्णायक झटका
दिया जिसके कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अपनी चुनावी रणनीति को पुनर्परिभाषित
किये बिना विरोधी दलों के लिए भाजपा की चुनौती से मुकाबला करना आने वाले समय में
आसान नहीं होने जा रहा है। इसीलिए यह कहा जा रहा है कि सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव ने
मंडल की राजनीति को भले ही अप्रासंगिक नहीं बनाया हो, पर इसने यह ज़रूर स्पष्ट कर
दिया कि अब जाति-आधारित राजनीति द्वारा धर्म-आधारित राजनीति को हाशिये पर रखना
संभव नहीं है, इन दोनों के बीच के समीकरण बदल चुके हैं और धर्म-आधारित राजनीति
जाति-आधारित राजनीति पर रही है।
इतना ही नहीं, इसने यह भी स्पष्ट कर
दिया कि जिस तरह धर्मनिरपेक्षता के नाम पर की जाने वाली राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण
का पर्याय बनती चली गयी और इसकी आड़ में बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यक हितों
को जो तवज्जो दी गयी, उससे बहुसंख्यक
समुदाय में उपजे असंतोष को भुनाते हुए भाजपा ने सफलतापूर्वक अपने उग्र-हिंदुत्व की
राजनीति की ऐसी पुख्ता ज़मीन तैयार की है, उसके विरोधियों के लिए जिसे आने वाले समय
में दरका पाना आसान तो नहीं ही होने जा रहा है।
सामाजिक न्याय और महिलाएँ:
जब सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव के परिणामों को सामाजिक न्याय के आलोक में
देखा जाए, तो यह हमें आश्वस्त भी करता है और आशंकित भी। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू
है महिला-मतदाताओं की बढ़ती हुई सक्रियता और चुनाव-परिणामों को निर्धारित करने में
उनकी महत्वपूर्ण होती भूमिका। ऐसा लग रहा है कि अब वे पुरुष-प्रभुत्ववादी शिकंजे
से मुक्त होकर अपने मताधिकारों के प्रयोग के सन्दर्भ में स्वतंत्र निर्णय लेने की
दिशा में बढ़ रही हैं। स्वतंत्र भारत में पहली बार संख्या की दृष्टि से मतदान के
मामले में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया और सन् 2019 के लोकसभा-चुनाव में पुरुषों एवं महिलाओं की वोटिंग का अंतर घटकर 0.4
रह गया है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए काँग्रेस ने तो महिला
मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए संसद एवं विधान-मंडल में महिला-आरक्षण को अपने
चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा बनाया। ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजेडी नेता नवीन
पटनायक ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी बीजू जनता दल से 33 प्रतिशत
टिकट महिलाओं के लिए आरक्षित करने की घोषणा की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और
तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने भी 40 प्रतिशत टिकट
महिलाओं को देने की घोषणा कर डाली। केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए/भाजपा-सरकार ने
उज्ज्वला, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सौभाग्य,
जन-धन खाते, मुद्रा-लोन, तुरंत ट्रिपल तलाक पर
कानून आदि के जरिए महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश की।
लेकिन, इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत मिला है और वह है 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसदों का पहुँचना और इसके
साथ लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी का 14 प्रतिशत के स्तर
पर पहुँचना, जो भारतीय संसदीय इतिहास में सर्वाधिक है; यद्यपि दुनिया के अन्य
हिस्सों के सापेक्ष और जनसंख्या के अनुपात में उनकी यह भागीदारी अब भी समुचित एवं
पर्याप्त नहीं है। 16वीं लोकसभा में करीब 11 प्रतिशत महिलाएँ थीं। इस बार आम चुनाव में खड़ी महिला उम्मीदवारों की
संख्या 10 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन
संसद में जीतकर पहुँचने वाली महिलाओं का प्रतिशत 14 है। इसका
परिणाम यह हुआ कि लोकसभा में पुरुष-सांसदों की संख्या 3 प्रतिशत की गिरावट के साथ
सन् 2014 के 462 से घटकर 2019 में 446 हो गया। यह भारत की चुनावी राजनीति में आ
रहे सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
बहरहाल
इनमें एक-तिहाई महिला सांसद ऐसी हैं, जिन्हें जनता ने दोबारा
भेजा है। यद्यपि उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल, दोनों ही राज्यों से 11-11
महिला-सांसद निर्वाचत हुई हैं, लेकिन चूँकि बंगाल में लोकसभा के लिए आवंटित सीटों
की संख्या उत्तर प्रदेश की तुलना में लगभग आधे के स्तर पर है, इसीलिए पश्चिम बंगाल
से महिला सांसदों का अनुपात उत्तर प्रदेश की तुलना में लगभग दोगुना है और इसका
श्रेय ममता बनर्जी एवं तृणमूल काँग्रेस को जाता है जिन्होंने 41 प्रतिशत टिकटें महिलाओं को दी थीं। राजनीतिक दलों में सर्वाधिक 40
महिला-सांसद भाजपा के टिकट पर निर्वाचित होकर आयी हैं।
सामाजिक न्याय और मुसलमान:
भारतीय
लोकतंत्र में मुसलमान और महिलाएँ, ये दोनों ही सामाजिक समूह अल्प-प्रतिनिधित्व के
शिकार रहे हैं, और उस पर तुर्रा यह कि पिछ्ली दो लोकसभाओं में बहुसंख्यकवाद की
राजनीति करके केंद्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा का एक भी सांसद मुसलमान नहीं है।
समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है, भाजपा ने विरोधी दलों पर मुस्लिम-तुष्टिकरण का जो
आरोप लगाया है और जिसमें कुछ हद तक सच्चाई भी है, उसके कारण विरोधी दल भी दबाव में
हैं और इस कारण उन्होंने भी मुसलमानों को उम्मीदवार बनाने से परहेज़ किया। इतना ही
नहीं, बहुसंख्यकवाद की राजनीति के कारण जो राजनीतिक-सामाजिक परिवेश सृजित हुआ,
उसमें मुसलमानों का चुनाव जीत पाना मुश्किल होता चला गया। इसका परिणाम यह हुआ कि न
केवल लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम होकर पाँच प्रतिशत से नीचे के स्तर
पर पहुँच गया, वरन् केन्द्रीय सत्ता में मुसलमानों की भागीदारी लगभग शून्य के स्तर
पर भी पहुँच गयी, जबकि देश की आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग पन्द्रह प्रतिशत के
स्तर पर है। सत्रहवीं लोकसभा-चुनाव में कुल मिला कर 25 मुसलमान
सांसद चुने गए हैं, जबकि सन् 1980 में यह 49 सांसदों के
साथ अधिकतम 9.20 प्रतिशत के स्तर पर था और सोलहवीं लोकसभा-चुनाव के दौरान यह 16
सांसदों के निम्नतम स्तर पर पहुँच गया। सत्तारूढ़ भाजपा ने कुल 6 मुसलमानों
को टिकट दिया था, लेकिन उसका एक भी मुस्लिम उम्मीदवार
चुनावी जीत नहीं हासिल कर सका।
कमोबेश
यही स्थिति विधानसभाओं में मुस्लिम-प्रतिनिधित्व की भी रही है। सन् (2013-15) के
दौरान होने वाले विधानसभा-चुनावों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 35 प्रतिशत
से घट कर 20 प्रतिशत हो गया। इसके बाद सन् नवम्बर-दिसम्बर,2018
में हुए पाँच राज्यों में चुनाव हुए तो यही हाल हुआ। इन विधानसभा-चुनावों
में छत्तीसगढ़ में 1, मध्य प्रदेश में 2, राजस्थान
में 8 और तेलंगाना में 8 मुसलमान विधायक
चुने गए। दरअसल इसका महत्वपूर्ण कारण एक तो मुख्यधारा से अलगाव के कारण मुस्लिम
उम्मीदवारों की गैर-मुस्लिम समुदायों के बीच स्वीकार्यता को लेकर आने वाली
परेशानियाँ हैं और दूसरे, स्वयं राजनीतिक दल भी मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व को लेकर
बहुत गंभीर नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि मुसलमानों के बीच ऐसे नेता नहीं उभरते हैं, जो
मुसलमानों के अलावा दूसरे समुदायों में भी स्वीकार्य हों ताकि उनका जीतना आसान हो।
यदि कोई ऐसा नेता उभरता भी है तो पार्टी कोशिश करती है कि उन्हें उन्हीं जगहों से
टिकट दिया जाए, जहां मुसलमान निर्णायक भूमिका में हों। इसका नतीजा यह होता है कि उन
नेताओं की कभी भी सर्वस्वीकार्य छवि नहीं बन पाती है। वे जब मुसलिम-बहुल इलाक़ों
से भी खड़े होते हैं तो ग़ैर-मुसलिम उन्हें ठीक से स्वीकार नहीं कर पाते हैं और
उनका जीतना वहाँ से भी मुश्किल होता है। संक्षेप में कहें, तो मुसलमानों के
प्रतिनिधित्व का प्रश्न पहचान की राजनीति के साथ-साथ अल्पसंख्यकवाद बनाम्
बहुसंख्यकवाद की राजनीति में उलझ कर रह गया है।
भविष्य
की संभावना:
संभव है कि अगड़ी
जातियों के समर्थन के प्रति आश्वस्त भाजपा आने वाले समय में बिहार की तरह उत्तर
प्रदेश में भी ओबीसी एवं दलित नेताओं को तरजीह दे सकती है और इसके जरिये सामाजिक
न्याय की राजनीति करने वालों को मात देने की रणनीति अपना सकती है। इतना ही नहीं, आनेवाले समय में भाजपा मुसलमानों से
सम्बंधित उन संवेदनशील मसलों (जिनकी दिशा में पहल खुद मुस्लिम समाज को और उनकी
रहनुमाई करने वाले धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व को करनी चाहिए थी, पर मुस्लिम तुष्टिकरण
की रणनीति के कारण जिसने इस दिशा में पहल से परहेज़ करते हुए इस्लामिक समाज में
प्रगतिशील सामाजिक सुधारों की प्रक्रिया को बाधित किया) को उठाकर मुस्लिम वोटबैंक
में सेंध भी लगाएगी और हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति को भी जारी रखेगी,
जैसा कि उसने तुरंत ट्रिपल तलाक जैसे मसलों को उठाकर किया। इतना ही नहीं, जिस तरीके से गुजरात और राजस्थान
में पहली बार लोकसभा चुनाव में उतरी भारतीय ट्राइबल पार्टी ने कड़ी टक्कर दी है, उम्मीद
की जा रही है कि आने वाले समय में यह पार्टी सामाजिक न्याय के दायरे का विस्तार
करती हुई अपनी मज़बूत एवं प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवाएगी।
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