सामाजिक न्याय की राजनीति (लैंगिक सन्दर्भ): पार्ट 3 : बिहार और राजनीतिक समावेशन
बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति: लैंगिक
सन्दर्भ
प्रमुख आयाम
1.
सामाजिक न्याय की राजनीति: बिहार के विशेष सन्दर्भ में
2.
17वीं लोकसभा-चुनाव: सामाजिक न्याय के लैंगिक सन्दर्भ
3.
सामाजिक न्याय की राजनीति
और महिलाएँ
4.
लालू
यादव और राजद: सामाजिक न्याय की राजनीति (लैंगिक संदर्भ)
5.
नीतीश
कुमार और जद(यू): सामाजिक न्याय की राजनीति (लैंगिक संदर्भ)
6.
केन्द्र
सरकार की हालिया पहल
7.
बिहार विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व:
a. महिलाओं का प्रतिनिधित्व(अबतक)
b. बिहार विधानसभा-चुनाव,2020
c. महिला-विधायकों में
कमी
d. गिरावट का कारण
e.
चुनावी एजेंडे में महिलाएँ
सामाजिक न्याय की राजनीति: लैंगिक सन्दर्भ
बिहार के विशेष सन्दर्भ में
17वीं
लोकसभा-चुनाव: सामाजिक न्याय के लैंगिक सन्दर्भ:
सत्रहवीं
लोकसभा-चुनाव के परिणामों को सामाजिक न्याय के आलोक में देखा जाए, तो यह हमें
आश्वस्त भी करता है और आशंकित भी। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है महिला-मतदाताओं की
बढ़ती हुई सक्रियता और चुनाव-परिणामों को निर्धारित करने में उनकी महत्वपूर्ण होती
भूमिका। ऐसा लग रहा है कि अब वे पुरुष-प्रभुत्ववादी शिकंजे से मुक्त होकर अपने
मताधिकारों के प्रयोग के सन्दर्भ में स्वतंत्र निर्णय लेने की दिशा में बढ़ रही हैं।
स्वतंत्र भारत में पहली बार संख्या की दृष्टि से मतदान के मामले में महिलाओं ने
पुरुषों को पीछे छोड़ दिया और सन् 2019 के लोकसभा-चुनाव में
पुरुषों एवं महिलाओं की वोटिंग का अंतर घटकर 0.4 रह गया है। इन
बातों को ध्यान में रखते हुए काँग्रेस ने तो महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के
लिए संसद एवं विधान-मंडल में महिला-आरक्षण को अपने चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा
बनाया। ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजेडी नेता नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनाव में अपनी
पार्टी बीजू जनता दल से 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं के लिए आरक्षित
करने की घोषणा की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता
बनर्जी ने भी 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने की घोषणा कर
डाली। केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए/भाजपा-सरकार ने उज्ज्वला, बेटी
बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सौभाग्य, जन-धन खाते,
मुद्रा-लोन, तुरंत ट्रिपल तलाक पर कानून आदि के जरिए महिला मतदाताओं
को अपनी ओर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश की।
लेकिन, इसी के
साथ एक और महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत मिला है और वह है 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसदों का पहुँचना और इसके
साथ लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी का 14 प्रतिशत के स्तर
पर पहुँचना, जो भारतीय संसदीय इतिहास में सर्वाधिक है; यद्यपि दुनिया के अन्य
हिस्सों के सापेक्ष और जनसंख्या के अनुपात में उनकी यह भागीदारी अब भी समुचित एवं
पर्याप्त नहीं है। 16वीं लोकसभा में करीब 11 प्रतिशत महिलाएँ थीं। इस बार आम चुनाव में खड़ी महिला उम्मीदवारों की
संख्या 10 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन
संसद में जीतकर पहुँचने वाली महिलाओं का प्रतिशत 14 है। इसका
परिणाम यह हुआ कि लोकसभा में पुरुष-सांसदों की संख्या 3 प्रतिशत की गिरावट के साथ
सन् 2014 के 462 से घटकर 2019 में 446 हो गया। यह भारत की चुनावी राजनीति में आ
रहे सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
बहरहाल इनमें एक-तिहाई महिला सांसद
ऐसी हैं, जिन्हें जनता ने दोबारा भेजा है। यद्यपि उत्तर प्रदेश
और पश्चिम बंगाल, दोनों ही राज्यों से 11-11 महिला-सांसद निर्वाचत हुई हैं, लेकिन
चूँकि बंगाल में लोकसभा के लिए आवंटित सीटों की संख्या उत्तर प्रदेश की तुलना में
लगभग आधे के स्तर पर है, इसीलिए पश्चिम बंगाल से महिला सांसदों का अनुपात उत्तर
प्रदेश की तुलना में लगभग दोगुना है और इसका श्रेय ममता बनर्जी एवं तृणमूल
काँग्रेस को जाता है जिन्होंने 41 प्रतिशत टिकटें महिलाओं को
दी थीं। राजनीतिक दलों में सर्वाधिक 40 महिला-सांसद भाजपा के टिकट पर निर्वाचित
होकर आयी हैं।
सामाजिक न्याय की राजनीति और महिलाएँ:
जब
1960 के दशक में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने सामाजिक न्याय को समाजवादी राजनीति का एजेंडा बनाया, तो
उन्होंने इसके दायरे में लैंगिक न्याय को भी लेन की कोशिश की। उन्होंने लैंगिक विभेद के खिलाफ
आवाज़ उठाते हुए सामाजिक न्याय की अवधारणा को लैंगिक विभेद के खिलाफ लड़ाई के उपकरण
में तब्दील कर दिया और उसे लैंगिक समावेशन तक विस्तार देते हुए कहा कि ‘एक वयस्क
मर्द और औरत के बीच वादाखिलाफी और बलात्कार के अलावा सारे सम्बन्ध जायज़ हैं।’ आगे चलकर, डॉ. लोहिया की राजनीतिक परम्परा को आगे
बढ़ाते हुए कर्पूरी ठाकुर ने ‘कर्पूरी फ़ॉर्मूला’ के
ज़रिए उनकी सामाजिक न्याय की विरासत को समृद्ध करने की कोशिश की और सन्
1978 में इसके तहत् सभी जातियों की महिलाओं के लिए
आरक्षण की दिशा में पहल करते हुए 3 प्रतिशत का सब-कोटा निर्धारित किया। इस प्रकार उन्होंने लैंगिक मसले का
राजनीतिकरण करते हुए इसे सामाजिक न्याय
के प्रश्न से ले जाकर सम्बद्ध कर दिया।
लालू यादव और राजद: सामाजिक न्याय की राजनीति (लैंगिक
संदर्भ)
1990 के दशक में जब सामाजिक न्याय की राजनीति के
बढ़ते जोर ने जाति के प्रश्न को इसके केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया, और बिहार में
लालू यादव ने इस रजनीति को नेतृत्व प्रदान किया। यद्यपि इस दौर में राबड़ी देवी के रूप में बिहार को पहली महिला
मुख्यमन्त्री भी मिली, तथापि सामाजिक न्याय की राजनीति में महिलाओं को जो अपेक्षित
एवं वांछित स्थान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। दरअसल राबड़ी देवी
वंशवादी-परिवारवादी राजनीति का कहीं अधिक प्रतिनिधित्व करती थीं, बनिस्बत की
सामाजिक न्याय की राजनीति के। उनके नेतृत्व में भी राजद की सोच सामन्ती एवं
पितृसत्तात्मक बनी रही। पिछड़े वर्ग और दलित समुदाय की महिलाओं के लिए सब-कोटा के
नाम पर संसद एवं विधानमंडल में महिला-आरक्षण के विरोध के मूल में भी उसकी यही मानसिकता
प्रतिबिम्बित होती है।
नीतीश कुमार और जद(यू): सामाजिक न्याय की राजनीति (लैंगिक
संदर्भ)
जब
सन् 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार
बनी, तो नीतीश कुमार ने अपनी सरकार के एजेंडे में महिला-कल्याण और महिला-सशक्तीकरण
को शीर्ष पर रखते हुए महिलाओं के बीच जनाधार तलाशने की कोशिश की। इसी रणनीति के तहत् उन्होंने उन योजनाओं एवं कार्यक्रमों को
डिज़ाइन किया जो महिला-कल्याण और महिला-सशक्तीकरण के उद्देश्यों से परिचालित थे। मुख्यमंत्री कन्या साइकिल योजना, मुख्यमंत्री कन्या पोशाक
योजना, बालिकाओं को ग्रेजुएशन तक की शिक्षा के क्रम में 55,000 रुपये की वित्तीय
सहायता, पंचायतों में 50 प्रतिशत महिला-आरक्षण, सात निश्चय के अंतर्गत आरक्षित
रोजगार, महिलाओं का अधिकार’ को सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नौकरियों में 35
प्रतिशत महिला-आरक्षण, महिला बटालियन का गठन, बाल-विवाह एवं दहेज़-प्रथा के खिलाफ
अभियान, शराबबन्दी की दिशा में पहल और महिला स्वयं सहायता समूह (Women SHG), जिनकी
संख्या करीब 10 लाख है और जिनसे करीब एक करोड़ महिलाएँ लाभान्वित हो रही हैं, के
ज़रिए महिलाओं में स्वरोजगार को बढ़ावा उनकी इसी दिशा में पहल के परिणाम हैं। बिहार विधानसभा-चुनाव,2020
के ठीक पहले नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने सात
निश्चय 2.0 का रोडमैप प्रस्तुत किया जिसमें ‘सशक्त महिला, सक्षम महिला’ की बात की गयी। इसके तहत् महिला-सशक्तीकरण के लिए सरकारी ऑफिसों में आरक्षण
के मुताबिक महिलाओं की भागीदारी तय करने की बात की गयी है। साथ ही, इंटर पास और स्नातक होने पर अविवाहित छात्रा को
सरकार की ओर से क्रमशः 25 हजार रुपए और 50
हजार रुपए की आर्थिक मदद देने की घोषणा की गयी है। इस पृष्ठभूमि में देखा जाए, तो राष्ट्रीय राजनीति
में नीतीश कुमार की पहचान एक ऐसे राजनेता के रूप में बनती हुई दिखाई पड़ती है जिसने
सकारात्मक एजेंडे के साथ महिलाओं से जुड़े मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए
महिला-कल्याण, महिला-विकास और महिला-सशक्तीकरण के मार्ग को प्रशस्त करते हुए
महिलाओं को समाज, राजनीति एवं विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जिसका
दीर्घकालिक असर आने वाले समय में भारतीय समाज एवं राजनीति में देखने को मिलेगा।
इसका इतना तो फायदा मिलता दिख रहा है कि पिछले डेढ़ दशकों के दौरान महिला-मतदाताओं
की जागरूकता और उनकी सक्रियता ने बिहार की चुनावी राजनीति को एक नयी दिशा देने की
कोशिश की है, अब यह बात अलग है कि नीतीश कुमार और उनके दल को इसका राजनीतिक रूप से
कितना फायदा मिल पाता है, विशेषकर तब जब बिहार की राजनीति धर्म एवं जाति की जाल
में बुरी तरह से उलझी हुई है।
दरअसल,
इसके ज़रिए नीतीश कुमार ने अपने कमजोर जातिगत आधार वाले वोटबैंक की भरपाई करनी चाही।
ध्यातव्य है कि नीतीश कुमार जिस कुर्मी जाति से आते हैं, उसकी आबादी बिहार में महज
3.3 प्रतिशत के आस-पास है, जबकि जिस
कुशवाहा समुदाय से जुड़कर उन्होंने अपने लव-कुश समीकरण (7.7 प्रतिशत) विकसित किया,
उसकी आबादी 4.4 प्रतिशत के स्तर पर। इसलिए उन्हें यह मालूम था कि देर-सबेर लव-कुश
समीकरण के अंतर्विरोध मुखर होंगे और कुशवाहा समाज उनसे दूर छिटकेगा।
केन्द्र सरकार की हालिया पहल:
बिहार सरकार की इस पहल को ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना से लेकर सुकन्या
समृद्धि योजना जैसी केन्द्र सरकार की महिला-केन्द्रित योजनाओं एवं कार्यक्रमों से
भी मदद ली। सन् 2016 में केन्द्र सरकार ने
मातृत्व अवकाश की अवधि को विस्तार दिया और फिर उज्ज्वला योजना के माध्यम से जलावन एवं
महिला-स्वास्थ्य की समस्या के समाधान की दिशा में पहल की। इसी प्रकार स्वच्छ भारत
योजना के अंतर्गत स्वच्छ भारत योजना के अंतर्गत राज्य में बड़ी संख्या में शौचालयों
के निर्माण के ज़रिए महिलाओं की शौच और महिला-सम्मान की समस्या का समाधान प्रस्तुत
किया। इसी प्रकार केन्द्र सरकार जन-धन और मुद्रा जैसी योजनाओं ने वितीय समावेशन के
ज़रिए महिलाओं के सशक्तीकरण में अहम् भूमिका निभायी। कोरोना-संकट और लॉकडाउन के
दौरान केन्द्र सरकार की ओर से महिलाओं के जन-धन खाते में लगातार तीन महीने तक 500
रुपये प्रतिमाह के हिसाब से कुल 1,500 रुपये की राशि ट्रान्सफर की गयी। इसके
अतिरिक्त, सेना में भी महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया गया।
बिहार विधानसभा
में महिलाओं का प्रतिनिधित्व:
जहाँ तक बिहार विधानसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व
का प्रश्न है, तो सत्रहवें विधानसभा-चुनाव,2020 के पहले तक सन् (1952-2015) के
दौरान सम्पन्न विधानसभा चुनावों में कुल 289 महिलाओं ने जीत
हासिल करते हुए विधानसभा की दहलीज पर कदम रखा है जो अब तक जीते कुल 4765 विधायकों का महज 6.45 फीसदी है। इनमें सन् 2010 में सम्पन्न विधानसभा-चुनाव में सर्वाधिक 34 महिला उम्मीदवारों ने चुनावी जीत हासिल करते
हुए विधानसभा की दहलीज़ पर कदम रखा, जबकि सन् 1969 महिला-प्रतिनिधित्व
के लिहाज़ से निराशाजनक रहा जब केवल चार महिलाएँ ही विधानसभा पहुँच सकीं।
जहाँ
तक राजनीतिक दलों के लैंगिक रुझानों का प्रश्न है, तो अबतक काँग्रेस से सर्वाधिक 120 महिला उम्मीदवारों ने चुनावी जीत हासिल की है, और
उसके बाद जनता दल(यू) का नंबर आता है जिसके अबतक 52 महिला उम्मीदवारों ने चुनावी जीत हासिल की है। इसी प्रकार भाजपा के 28, राजद के 23, जनता पार्टी
के 16, जनता दल के 5, सीपीआई के 3 और निर्दलीय विधायकों
की संख्या 9 रही है।
अबतक विधानसभा चुनाव, 2010 में
जनता दल(यू) के सर्वाधिक 23 महिला उम्मीदवारों ने चुनावी जीत हासिल करते हुए एक चुनाव में एक दल से सर्वाधिक महिला
प्रत्याशियों के जीतने के काँग्रेस के रिकॉर्ड को तोड़ा। इस मामले में दूसरे नम्बर
पर काँग्रेस है जिसकी सन् 1957 में सर्वाधिक 22 महिला विधायक चुनी गईं।
बिहार विधानसभा-चुनाव,2020: महिला-विधायकों
में कमी:
इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में सन् 2015 के 273 के मुकाबले कुल 371 महिला
उम्मीदवारों ने शिरकत की जिसके कारण इस बार चुनाव में भाग लेने वाली महिला
उम्मीदवारों का प्रतिशत 8 से बढ़कर 10 हो गया। इनमें से 84 महिला उम्मीदवार दोनों प्रमुख गठबन्धनों और एलजेपी से
सम्बंधित थे। इन 84 महिला उम्मीदवारों में 29
महिला उम्मीदवारों का सम्बंध राजनीतिक-पारिवारिक पृष्ठभूमि से है जिनमें 13 महिला
उम्मीदवारों को जीत मिली। इसका
मतलब यह है कि 13 नवनिर्वाचित महिला विधायक राजनीतिक-पारिवारिक
पृष्ठभूमि से आती हैं ऐसे महिला
उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट अपेक्षाकृत बेहतर रहा। पर, इन सबके बावजूद विधानसभा-चुनाव,2020
में सन् 2015 के 28 महिला विधायक के मुकाबले महज 26 महिला उम्मीदवार निर्वाचित हुईं। ध्यातव्य है कि बिहार विधानसभा के अबतक के
इतिहास में विधानसभा-चुनाव,2010 में
महिलाओं का प्रतिनिधित्व 34 के अधिकतम के स्तर पर था, लेकिन तब से महिला विधायकों
की संख्या में निरंतर गिरावट आयी है। हाल में सम्पन्न विधानसभा-चुनाव में दो-तिहाई
महिला विधायक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से सम्बद्ध हैं,
जबकि एक-तिहाई महिला विधायक महागठबंधन से सम्बद्ध। इस प्रकार 26 महिला विधायकों में 17 एनडीए से हैं, जबकि 9 महिला
विधायक महागठबंधन से। इनमें
सर्वाधिक 9 विधायक भाजपा के, 7
विधायक राजद के, 6 विधायक जदयू के, 2 विधायक काँग्रेस के और
1-1 विधायक हम एवं वीआईपी से हैं।
गिरावट का कारण:
जहाँ तक बिहार विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी में इस
गिरावट का प्रश्न है, तो अक्सर राजद पर यह आरोप लगाया जाता है कि लैंगिक दृष्टि से राजद का
स्वरुप समावेशी नहीं रहा है और राजनीतिक समावेशन के मद्देनज़र इसका प्रदर्शन निराशाजनक
रहा है। उसके इस रुख की पुष्टि तब भी हुई जब इसने संसद एवं विधानमंडल में महिला-आरक्षण
का विरोध किया। इसके पक्ष में यह भी तर्क दिया जाता है कि बिहार विधानसभा के अबतक के इतिहास में विधानसभा-चुनाव,2010 में
महिलाओं का प्रतिनिधित्व 34 के अधिकतम के स्तर पर था, जबकि राजद विधायक दल का आकार
सिमटकर 22 के स्तर पर रह गया था जो राजद के अबतक के इतिहास में न्यूनतम है। सन्
2015 के विधानसभा चुनाव में राजद की स्थिति मज़बूत हुई और महिला विधायकों की संख्या
सिमटकर 28 रह गयी। इनमें 10 महिला विधायक राजद से, 9 महिला विधायक जनता दल (यू) से
और 4-4 महिला विधायक काँग्रेस एवं भाजपा से सम्बद्ध थीं, जबकि 1 महिला-विधायक
निर्दलीय थीं। इस बार तो यह संख्या 2 की गिरावट के साथ 26 महिला विधायक पर पहुँच
गयी।
ऐसा नहीं कि यह आरोप
निराधार है, या फिर इसमें कोई सच्चाई ही नहीं है। लेकिन, यह आंशिक रूप से ही सच है।
वास्तविकता यह है कि बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में जनता दल (यूनाइटेड) को छोड़कर महिलाओं के राजनीतिक समावेशन
के सन्दर्भ में कमोबेश सभी दलों की स्थिति एकसमान दिखाई पड़ती है। इसकी
पुष्टि हाल में सम्पन्न विधानसभा-चुनाव और इसके परिणामों से भी होती है जिसकी
विस्तार से चर्चा की गयी है। वर्तमान में इस गिरावट का महत्वपूर्ण कारण है जनता दल यूनाइटेड के प्रदर्शन में गिरावट। ध्यातव्य
है कि इस चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी(LJP), इन दोनों
राजनीतिक दलों ने अधिकतम 22 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था जो उनके द्वारा आवंटित
उम्मीदवारों का क्रमशः 19.1 प्रतिशत एवं 16.3 प्रतिशत था, लेकिन इस चुनाव में जनता
दल (यूनाइटेड) 43 विधानसभा क्षेत्रों में जीत मिली, जबकि लोक जनशक्ति पार्टी(LJP)
महज एक विधानसभा क्षेत्र में चुनावी जीत दर्ज कर सकी। स्पष्ट है कि इन दोनों राजनीतिक दलों का प्रदर्शन
अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा जिसका असर
इन दोनों दलों के महिला-उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर भी पड़ा और जनता दल (यूनाइटेड)
से महज 6 महिला उम्मीदवारों को जीत मिली।
जहाँ तक एनडीए का प्रश्न है, तो इसने 37
महिलाओं (करीब 15 प्रतिशत) को उम्मीदवार बनाया जिनमें 17 महिला उम्मीदवारों ने जीत
हासिल की। भाजपा
ने जिन 110 विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा, उनमें महज 13 महिला उम्मीदवारों (11.8 प्रतिशत) को टिकट दिया
जिनमें 9 महिला उम्मीदवार विधानसभा पहुँचने में
सफल रहीं। हम और
वीआईपी ने एक-एक महिला उम्मीदवार को टिकट दिया और उन दोनों को जीत मिली।
जहाँ तक महागठबंधन की बात है, तो इसमें शामिल पाँचों
राजनीतिक दलों ने कुल-मिलाकर महज 25 महिला उम्मीदवारों (लगभग 10 प्रतिशत) को टिकट
दिए जिनमें केवल 9 महिला उम्मीदवारों को जीत मिली। इनमें 144 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने वाले सबसे
बड़े राजनीतिक दल राजद ने महज 16 महिलाओं लगभग (11 प्रतिशत) को उम्मीदवार
बनाया जिनमें जीत महज 7 महिला उम्मीदवारों को मिली। इनमें आधे महिला उम्मीदवार
राजनीतिक-पारिवारिक पृष्ठभूमि से थीं जिनमें आधे महिला उम्मीदवारों को जीत मिली। ध्यातव्य है कि सन् 2000 से अबतक
सम्पन्न छह विधानसभा-चुनावों में राजद ने जिन 430 विधानसभा क्षेत्रों में जीत
हासिल की, उनमें महज 28 स्थानों पर महिलाओं को जीत मिली। काँग्रेस ने 8 महिलाओं (11.4
प्रतिशत) को उम्मीदवार बनाया, लेकिन लोअर स्ट्राइक रेट के कारण काँग्रेस की केवल
दो महिला उम्मीदवार ही जीत हासिल कर सकीं। पिछले दो दशकों के दौरान काँग्रेस के टिकट पर केवल 9
महिला उम्मीदवार ही विधानसभा पहुँच सकीं। इसके
अलावा, 29 विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वाले तीन वामपंथी
दलों ने महज एक महिला को अपना उम्मीदवार बनाया जो
विधानसभा पहुँचने में असफल रही। सन्
1995 में बक्सर से जीतने वाली मंजू प्रकाश अन्तिम वामपन्थी महिला विधायक थीं, तब
से अबतक अन्य कोई महिला उम्मीदवार वामपन्थी दलों से निर्वाचित होने में सफल नहीं
रहा।
चुनावी
एजेंडे में महिलाएँ:
बिहार में महिला वोटर्स की बड़ी अहम भूमिका रही
है। बिहार में कोई भी पार्टी बिना इस आधी-आबादी के सहयोग के सत्ता हासिल नहीं कर
सकती। यही वजह रही कि जहाँ राजग गठबंधन और नीतीश कुमार ने बालिकाओं एवं महिलाओं के
लिए कल्याणकारी स्कीमों, शराबबंदी और पंचायत एवं सरकारी नौकरियों में महिला-आरक्षण
को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया, वहीं महागठबंधन और तेजस्वी यादव ने
जीविका दीदियों, आशा बहनों, आँगनबाड़ी सहायिकाओं और अन्य महिला संगठन की
कर्मचारियों बदहाली को मुद्दा बनाते हुए उनकी नौकरी पक्का करने का आश्वासन देकर
उनके भरोसे को हासिल करने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, राजग-गठबंधन ने राजद और
लालू के जंगल-राज की याद दिलाने की कोशिश करते हुए क़ानून एवं व्यवस्था और सुरक्षा
के मसले को चुनावी एजेंडा बनाने की हरसंभव कोशिश भी की और इसका असर विशेष रूप से
युवा महिला-मतदाताओं पर पड़ा।
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