काँग्रेस: बलि का बकरा नहीं (बिहार-चुनाव 2020)
काँग्रेस: बलि का बकरा नहीं
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काँग्रेस बलि का बकरा नहीं कि जब मौका मिला शुरू हो गए और काँग्रेस पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। काँग्रेस की कमजोरियों को महागठबंधन की कमियों को ढँकने का साधन नहीं बनने दीजिए। यह सच है कि न तो बिहार में काँग्रेस का संगठनात्मक ढ़ाँचा ऐसा था, न उसके पास इतने कार्यकर्ता थे और न ही उसके पास इतने सक्षम उम्मीदवार थे कि वह सत्तर सीटों पर चुनाव लड़ सके। टिकट-वितरण के क्रम में 29 बाहरियों को टिकट देकर इसने सारा गुड़-गोबर कर दिया।
पिछले विधानसभा चुनाव से तुलना उचित नहीं:
यह भी सच है कि इस साल के विधानसभा चुनाव की तुलना पिछले विधानसभा चुनाव से नहीं की जा सकती है क्योंकि पिछले साल महागठबंधन के सामाजिक समीकरण इस बार की तुलना में कहीं अधिक दुरुस्त थे। यही कारण है कि पिछली बार जिस राजद ने महज़ 100 सीटों पर चुनाव लड़कर 81 सीटें हासिल की थी, उसी राजद को इस बार 141 स्थानों में महज़ 75 स्थान मिले। इस बात को भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पिछली बार महागठबंधन ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था जिसके कारण सवर्ण वोट हासिल में सुविधा हुई, लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा गया और कई स्थानों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि कहीं तेजस्वी मुख्यमंत्री न बन जाए, इस स्थिति को टालने के लिए स्वर्ण मतदाताओं ने महागठबंधन के उम्मीदवारों को वोट देने से परहेज़ किया। काँग्रेस, जिसका वोटबैंक प्रमुखत: सवर्णों के बीच है, उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा।
काँग्रेस के प्रांतीय नेतृत्व की जिम्मेवारी:
यह सच है कि काँग्रेस का राज्य-नेतृत्व पिछले पाँच वर्षों के दौरान सन् 2015 में मिली 27 सीटों का फ़ायदा उठा पाने में असमर्थ रहा। आज काँग्रेस के प्रांतीय नेतृत्व ने सिर्फ इसलिए काँग्रेस को राजद का पिछलग्गू बना दिया कि या तो उन्हें अपनी मठों एवं मठाधीशी को बचना था, या उन्हें अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में सेट करना था। इसके लिए इन्होंने पार्टी को मृतप्राय स्थिति में पहुँचा दिया। अब वो चाहे मदन मोहन झा हों, या अखिलेश सिंह, सदानन्द सिंह हों या फिर कोई और।
काँग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की जिम्मेवारी:
इतना ही नहीं, इस स्थिति के लिए काँग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी कहीं कम ज़िम्मेवार नहीं है। जो पार्टी क़रीब एक तिहाई से कुछ कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उस पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व चुनाव को लेकर इतना निष्क्रिय और उदासीन हो, यह पचने वाली बात नहीं है। जहाँ राहुल गाँधी ने तीन चरणों वाले इस चुनाव के दौरान महज़ तीन दिन का समय दिया और उस तीन दिन में भी महज़ छह सभाएँ की, वहीं प्रियंका गाँधी, जो हाल के दिनों में काँग्रेस के सबसे विश्वसनीय चेहरे के रूप में उभर कर सामने आया है, की उदासीनता और निष्क्रियता हतप्रभ करती है। छह वर्ष हो गए, पर काँग्रेस-नेतृत्व यह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है कि मोदी-शाह ने राजनीति को 24x7 में तब्दील कर दिया है। इस सामान्य-सी बात को समझे बिना भाजपा से मुक़ाबला कर पाना मुश्किल है।
राजद की ज़िम्मेवारी:
काँग्रेस के इस कमजोर स्ट्राइक रेट के लिए राजद भी कहीं कम ज़िम्मेवार नहीं था क्योकि सीटों के आवंटन में चालाकी बरतते हुए राजद ने अपने पास अपेक्षाकृत आसान सीटें रखीं और काँग्रेस को मुश्किल सीटें दी। काँग्रेस 70 सीटों से संतुष्ट हो गयी, और उसने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उसे वे सीटें हासिल हो जहाँ वह बेहतर स्थिति में हैं जहाँ जीतने की बेहतर संभावना है। वाम दलों ने ऐसा ही किया और उसका स्ट्राइक रेट बेहतर रहा। इसका परिणाम यह रहा कि इस क्रम में उसकी सीमित शक्ति भी छितराकर रह गयी। भले ही आज दीपांकर भट्टाचार्या काँग्रेस को 70 सीटें मिलने पर प्रश्न खड़े करते हुए यह दावा कर रहे हों कि अगर इतनी सीटें लेफ्ट को मिली होतीं, तो आज बिहार विधानसभा-चुनाव में महागठबंधन को बहुमत मिला होता। लेकिन, यह दावा करते हुए दीपंकर भट्टाचार्या इस बात को भूल गए कि बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र में लेफ्ट, मटिहानी विधानसभा क्षेत्र में सीपीआई और बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में सीपीएम की क्या भूमिका रही है, या काँग्रेस की तरह उन्हें भी मुश्किल सीटें मिलती, तो क्या होता?
महागठबंधन का कमजोर प्रबंधन:
इतना ही नहीं, महागठबंधन का प्रबंधन भी अत्यन्त कमजोर था, अन्यथा बेहतर आपसी समझ और बेहतर समन्वयन के ज़रिए गठबंधन का सबसे बड़ा दल राजद मज़बूत एवं प्रभावी उम्मीदवार की तलाश में काँग्रेस की मदद कर सकता था और ज़रूरत पड़ने पर ऐसे उम्मीदवार अपने दल से उपलब्ध करवा सकता था, लेकिन वह भी महागठबंधन के बजाय अपने बारे में सोचता रहा। इससे काँग्रेस का स्ट्राइक रेट बुरी तरह से प्रभावित हुआ। यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रुरत है कि कई सीटों पर काँग्रेस काफी क्लोज गयी और फिर हारी है।
काँग्रेस के लिए सबक:
अंत में कहूँ, तो यह चुनाव काँग्रेस के लिए दोबारा मौका है। शायद यह मौक़ा आगे फिर न मिले क्योंकि सन् 2025 तक आते-आते बिहार की राजनीति बहुत कुछ बदल चुकी होगी। 19 विधायक कम नहीं होते। अगर वे सोच लें और ठान लें, तो अपने-अपने क्षेत्र में काँग्रेस का सांगठनिक ढाँचे को मजबूती प्रदान करते हुए काँग्रेस को पुनर्जीवित करने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका, जिसको निभाने में वे पिछले छः वर्षों के दौरान चूक गए, का निर्वाह कर सकते हैं। काँग्रेस यह समझे कि बहुत ही शिद्दत के साथ देश को उसकी ज़रुरत है, अन्यथा देश नए विकल्प तो तलाश ही लेगा, पर काँग्रेस को मरना होगा। आज पूरी लड़ाई काँग्रेस को न मरने देने की है क्योंकि देश यह समझता है कि फिलहाल उसके पास काँग्रेस के विकल्प नहीं हैं।
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