सामाजिक न्याय की राजनीति: पार्ट टू: मण्डल-पूर्व परिदृश्य : कर्पूरी ठाकुर

 

सामाजिक न्याय की राजनीति: मण्डल-पूर्व परिदृश्य

पार्ट टू: कर्पूरी ठाकुर और सामाजिक न्याय

प्रमुख आयाम

1.  समाजवादियों के राजनीतिक एजेंडे में सामाजिक न्याय

2.  वामपंथियों से भिन्नता

3.  वर्चस्वशाली मध्यवर्ती जातियों को राजनीतिक नेतृत्व

4.  कर्पूरी ठाकुर की रोज़गार-नीति: सामाजिक न्याय और शिक्षा

5.  निर्णायक भूमिका में पिछड़ा वर्ग और कृषक जातियाँ

6.  सामाजिक न्याय की राजनीति पुनर्परिभाषित

7.  आरक्षण का कर्पूरी फ़ॉर्मूला

8.  सामाजिक न्याय की राजनीति का अंतर्विरोध

9.  कर्पूरी-फ़ॉर्मूले का समाजवादी आन्दोलन पर प्रभाव

10.         कर्पूरी फ़ॉर्मूले का राजनीतिक असर

11.         विश्लेषण

समाजवादियों के राजनीतिक एजेंडे में सामाजिक न्याय:

स्वतंत्र भारत में डॉ. भीम राव अम्बेडकर से तमाम असहमतियों के बावजूद उनकी ‘सामाजिक न्याय की राजनीति’ की राजनीतिक विरासत को समाजवादियों ने अपनाते हुए 1960 के दशक में इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया। लेकिन, 1960 के दशक में इसे चुनावी मुद्दा बनाने से करीब एक दशक पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया की संयुक्त समाजवादी पार्टी (संसोपा) ने अपनी आरक्षण-नीति को अंतिम रूप दिया। सन् 1959 में इसने ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी नौकरियों एवं अन्य संस्थानों में 60 प्रतिशत आरक्षण से सम्बंधित प्रस्ताव पारित किया, और इस प्रकार आरक्षण एवं सामाजिक न्याय समाजवादी राजनीति का मुख्य एजेंडा बना। इनका कहना था कि जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी के बिना सामाजिक न्याय को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। इस दौर में समाजवादियों के बीच एक नारा लोकप्रिय हुआ: “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” सन् 1964 में डॉ. राम मनोहर लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी और कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के एक धड़े के विलय के पश्चात् संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी(संसोपा) बनीलेकिन, कर्पूरी ठाकुर ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के किसी हिस्से की सदस्यता से परहेज़ किया। जब लोहिया ने संसोपा से दूरी बनाई, तब भी कर्पूरी ठाकुर ने उनके साथ जाने से परहेज़ किया।

संसोपा की समाजवादी राजनीति ने ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछड़ा पावें सौ में साठ।’ का नारा देते हुए सामाजिक न्याय के एजेंडे को अपना लिया था। उस समय जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफ़ान रहेगा और कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा जैसे नारे समाजवादी आंदोलन से सम्बद्ध होकर आकाश में गुंजायमान होते थे  सन् 1967 के चुनाव में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाते हुए अपनी पहचान पिछड़े वर्गों के लोकप्रिय नेता के रूप में बनाई और डॉ. लोहिया की मृत्यु के बाद वे सबसे बड़े समाजवादी नेता के रूप में उभरे। उन्होंने बिहार की पिछड़ी जातियों के युवाओं को संगठित किया, और इन्हीं के प्रयासों से बिहार में सामाजिक-राजनीतिक रूपान्तरण की प्रक्रिया शुरू हुई जिसने पिछड़े वर्ग के नेतृत्व की उभार की प्रक्रिया को उत्प्रेरित किया। यही कारण है कि मण्डल-आन्दोलन के काफी पहले पिछड़े जाति और दलित पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को बिहार का नेतृत्व करने का अवसर मिला। अब वो दारोगा प्रसाद राय हों, या कर्पूरी ठाकुर, राम सुन्दर दास हों या फिर   भोला पासवान शास्त्री, जिन्हें पहला दलित मुख्यमंत्री होने का अवसर मिला। और तो और, अब्दुल गफ्फूर जैसे अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले लोगों को बिहार का नेतृत्व करने का मौका मिला।

वामपंथियों से भिन्नता:

स्पष्ट है कि राजनीति की धुरी को मेहनतक़श तबकों पर केंद्रित करना समाजवादियों का भी लक्ष्य था और वामपन्थियों का भी, पर जहाँ वामपन्थी मेहनतक़शों की तानाशाही के ज़रिये इस लक्ष्य को हासिल करना चाहते थे, वहीं समाजवादी जनतंत्र के माध्यम से इसकी पुष्टि सन् 1977 में लोकसभा में कर्पूरी ठाकुर के इस उद्घोष से होती है, “संसद के विशेषाधिकार कायम रहें, लेकिन जनता के अधिकार भी। यदि जनता के अधिकार कुचले जायेंगे, तो एक-न-एक दिन जनता संसद के विशेषाधिकारों को चुनौती देगी।”

वर्चस्वशाली मध्यवर्ती जातियों को राजनीतिक नेतृत्व:

1960 के दशक तक बिहार की राजनीति में पिछड़ी जातियों की श्रेणी में आने वाली यादव, कुर्मी एवं कोइरी जैसी वर्चस्वशाली मध्यवर्ती जातियाँ सामाजिक एवं राजनीतिक शक्ति के रूप में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाने लगी थीं, पर इनके पास योग्य, सक्षम एवं प्रभावशाली नेतृत्व का अभाव था। ऐसा नहीं कि ये मध्यवर्ती जातियाँ पूरी तरह से नेतृत्वविहीन थीं। इनके पास पुरानी पीढ़ी का नेतृत्व तो था, पर वह काँग्रेस का हिस्सा था और अपने जातीय हितों एवं आकांक्षाओं के प्रति उदासीन था। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें इन मध्यवर्ती जातियों ने राजनीतिक नेतृत्व के लिए कर्पूरी ठाकुर की ओर रुख किया और डॉ. लोहिया की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कर्पूरी ठाकुर ने उत्तर भारत में सवर्णों के राजनीतिक एवं सामाजिक वर्चस्व के समक्ष पिछड़े वर्ग की चुनौतियों को नेतृत्व प्रदान किया। इस रूप में उन्होंने पिछड़ी जातियों को राजनीतिक दृष्टि से एकजुट करते हुए उन्हें इस बात का अहसास दिलाया कि वे प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं। स्पष्ट है कि कर्पूरी ठाकुर ने इस अवसर को भुनाने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखा, अब यह बात अलग है कि वे इसे अन्त-अन्त तक सम्भाल कर रख नहीं पाए।

कर्पूरी ठाकुर की रोज़गार-नीति:

1960 के दशक में बिहार में समाजवादियों ने अन्य वामपंथी शक्तियों के साथ मिलकर हिन्दी-भाषी राज्यों, विशेषकर बिहार और उत्तरप्रदेश में जनांदोलन चलाए। इसी दौर में बिहार में बेरोज़गार इंजीनियरों का बड़ा आंदोलन चला जिसने सरकार से बेरोज़गार इंजीनियरों के लिए पदों के सृजन की माँग की। इस आंदोलन ने जिस राजनीतिक माहौल को सृजित किया, उसे अपने पक्ष में भुनाने के लिए कर्पूरी ठाकुर ने नई रोजगार-नीति की घोषणा की। इसके अंतर्गत सरकारी ठेकों में बेरोज़गार इंजीनियरों की निविदाओं को प्राथमिकता दी गयी और इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार सरकार के सिंचाई-विभाग में लगभग 8,000 बेरोज़गार इंजीनियरों को नौकरियाँ मिलीं। उनके इस कदम ने युवाओं और विशेष रूप से पिछड़े वर्ग के युवाओं के बीच उन्हें लोकप्रिय बनाते हुए उनका जनाधार तैयार किया।

सामाजिक न्याय और शिक्षा:

डॉ. लोहिया की तरह कर्पूरी ठाकुर ने भी सामाजिक न्याय के प्रश्न को आर्थिक न्याय और भारतीय भाषाओँ के प्रश्न से सम्बद्ध करके देखा और शिक्षा को समावेशी स्वरुप प्रदान करने की दिशा में पहल की। सन् 1968 में दलित एवं पिछड़ी जातियों के लोगों के जनतंत्र को स्थापित करने के लिए कर्पूरी ठाकुर ने संसोपा सरकार में उपमुख्यमंत्री-सह-शिक्षा मंत्री के रूप में स्कूलों में फीस माफ़ी और अंग्रेजी की अनिवार्यता की समाप्ति की दिशा में पहल की इस प्रकार उन्होंने हाशिए पर के समूह से आनेवाले मेहनतकश वर्गों के बच्चों को फीस एवं अंग्रेज़ी के दबाव से मुक्त करते हुए स्कूली शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की। सन् 1977 में बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने बिहार में शिक्षा-सुधारों को प्राथमिकता दी और देशी भाषा एवं मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा-नीति में बदलाव की दिशा में पहल की। यदि उनकी आरक्षण-नीति ने बिहार को जाति के आधार पर अगड़ों एवं पिछड़ों में विभाजित कर दिया, तो उनकी भाषा-नीति ने राज्य की राजनीति को वर्गीय और शहरी-ग्रामीण आधारों पर विभाजित कर दिया। सन् 1971 में मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने अलाभकर जोतों से मालगुजारी खत्म कर दी

निर्णायक भूमिका में पिछड़ा वर्ग और कृषक जातियाँ:

इसका परिणाम यह हुआ कि 1970 के दशक के मध्य तक आते-आते भारतीय राजनीति, विशेषकर हिन्दी पट्टी की राजनीति में पिछड़े वर्गों और कृषक जातियों की भूमिका इतनी निर्णायक बन गई कि किसी भी राजनीतिक दल, चाहे उसका सामाजिक जनाधार कुछ भी क्यों न हो, के लिए उसे इग्नोर करना मुश्किल होता चला गया। फलतः इस समय तक आते-आते ओबीसी आरक्षण के मसले पर राष्ट्राय सहमति बनने लगी और इसका परिणाम यह हुआ कि जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद सन् 1978 में बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग, जो मण्डल कमीशन के नाम से लोकप्रिय हुआ, का गठन किया गया।

सामाजिक न्याय की राजनीति पुनर्परिभाषित:

कर्पूरी ठाकुर ने आज़ादी और रोटीका नारा दिया जो गरिमा हेतु सामाजिक न्याय और अच्छे जीवन हेतु विकास की बात करता है। लेकिन, वे राज्य में विकास की कोई योजना लागू नहीं कर सके, या यूँ कह लें कि उन्हें विकास-योजनाओं को लागू करने का अवसर नहीं मिला। चूँकि उनकी सामाजिक न्याय की अवधारणा लोहियावाद के कहीं अधिक करीब है, इसीलिए उनकी सामाजिक न्याय की राजनीति में ब्राह्मणवादियों एवं पारंपरिक सामन्तों के लिए ही नहीं, पिछड़े वर्ग के नव-सामंतों एवं नव-ब्राह्मणों के लिए कोई जगह नहीं है। उनके मुख्यमंत्री रहते हुए ही बिहार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना था।

आरक्षण का कर्पूरी फ़ॉर्मूला:

बतौर मुख्यमंत्री अपनी दूसरी पारी में उन्होंने सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत का कोटा लागू करते हुए शैक्षणिक संस्थाओं और सरकारी ठेकों में भी आरक्षण का प्रावधान किया था। यह प्रावधान अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए पहले से उपलब्ध 24 प्रतिशत आरक्षण के अलावा किया गया। लेकिन, उनकी उपलब्धि यह नहीं रही। उनकी उपलब्धि थी अपने वोटबैंक में यादवों, कोइरी एवं कुर्मी जैसी वर्चस्वशाली ओबीसी जातियों की प्रभावशाली मौजूदगी की अनदेखी करते हुए पिछड़ी जातियों के लिए लागू आरक्षण-नीति में कोटे के अंदर कोटा’ की संकल्पना को इंट्रोड्यूस करना उन्होंने पिछड़े वर्गों को अनुलग्नक 1 (अति-पिछड़ा वर्ग:MBC), जिनके लिए 12 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया, और अनुलग्नक 2 (अन्य पिछड़ा वर्ग:OBC), जिनके लिए आठ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया, में विभाजित किया गया। चूँकि यह नीति कर्पूरी ठाकुर सरकार द्वारा लागू की गई थी, इसलिए इसे कर्पूरी ठाकुर फार्मूलाकहा जाता है। यही कारण है कि अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में उन्हें वर्चस्वशाली ओबीसी के एक हिस्से का ज़बरदस्त विरोध सहना पड़ा, और अन्ततः इस विरोध ने उनके राजनीतिक अवसान का मार्ग प्रशस्त किया।

लेकिन, उनकी सामाजिक न्याय की राजनीति का स्वरुप समावेशी था और इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि उन्होंने 3 प्रतिशत का सब-कोटा महिलाओं के लिए और 3 प्रतिशत का सब-कोटा आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए भी सृजित किया। स्पष्ट है कि आज जिस सामाजिक न्याय की चर्चा पूरे देश में हो रही है, उसे उत्तर भारत में व्यावहारिक स्वरुप प्रदान करने का श्रेय डॉ. कर्पूरी ठाकुर को जाता है जिन्होंने बिहार जैसे अर्द्ध-सामंती पिछड़े प्रान्त में समाजवादी राजनीति और चेतना को जमीनी धरातल पर उतारा

सामाजिक न्याय की राजनीति का अंतर्विरोध:

1970 के दशक के मध्य तक आते-आते ओबीसी आरक्षण के मसले पर राष्ट्रीय सहमति तो बनी, पर राज्यों के स्तर पर मतभेद बने रहे। जब सन् 1977 में बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर द्वारा इस दिशा में पहल को लेकर सवर्णों के बीच जनाधार वाले जनसंघ ने खुद को असहज पाया। लेकिन, जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व: चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच गहराते मतभेदों ने समाजवादियों और जनसंघ के अंतर्विरोधों को उद्घाटित करते हुए अन्ततः कर्पूरी ठाकुर को हाशिये पर पहुँचा दिया। यह प्रतिद्वंद्विता कर्पूरी ठाकुर और जगजीवन राम के बीच भी थी। इसलिए जब सन् 1978 में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण से सम्बंधित मुंगेरीलाल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दी। इस क्रम में उन्होंने पिछड़ी जातियों सहित पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की दिशा में पहल करते हुए ‘कोटे के भीतर कोटा’ की संकल्पना को इंट्रोड्यूस किया और इस क्रम में सभी जातियों की महिलाओं, आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों और अति-पिछड़े वर्गों को लक्षित करते हुए उनके लिए आरक्षण का सब-कोटा निर्धारित किया, तो 1960 के दशक में कर्पूरी ठाकुर को समर्थन देने वाला यह वर्ग खुद को ठगा-सा महसूस करने लगा और उसने ऊँची जातियों एवं दलितों के साथ मिलकर कर्पूरी ठाकुर के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।। अन्ततः कर्पूरी ठाकुर को इसकी कीमत चुकानी पड़ी और सन् 1979 में राम सुन्दर दास उनकी जगह मुख्यमन्त्री बने। राम सुंदरदास बिहार के नए मुख्यमंत्री बने। इस तरह एक ओबीसी के नेतृत्व वाली सरकार का स्थान एक दलित के नेतृत्व वाली सरकार ने ले लिया।

कर्पूरी-फ़ॉर्मूले का समाजवादी आन्दोलन पर प्रभाव:

बिहार में आरक्षण-नीति ने समाजवादी आंदोलन को जाति के आधार पर विभाजित कर दिया। इसने एक ओर ओबीसी और ऊँची जातियों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया, दूसरी ओर ओबीसी के अंदर भी विभाजक रेखाएँ खिंच गईं। इस विभाजन में लालू यादव कर्पूरी ठाकुर के साथ खड़े थे और नीतीश कुमार उनके विरोधी उच्च जाति के समाजवादियों के खेमे में। उस समय नीतीश कुमार ने ओबीसी के लिए आरक्षण का समर्थन भी किया और ऊँची जातियों के लिए आरक्षण का भी। आज भी नीतीश कुमार की राजनीति गैर-यादव पिछड़ी जातियों (OBC’s-MBC’s), महादलितों और ऊँची जातियों के साथ गठजोड़ के इर्द-गिर्द घूमती है।

कर्पूरी फ़ॉर्मूले का राजनीतिक असर:

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सन् 1980 तक आते-आते वर्चस्वशाली मध्यवर्ती जातियों का कर्पूरी ठाकुर से भी मोहभंग होने लगा, और ये नए नेतृत्व की ओर मुखातिब हुए। संयोगवश इस दौर में कर्पूरी ठाकुर के संरक्षण में इस वर्ग के बीच से भी नई पीढ़ी के राजनीतिक नेतृत्व का उभार हो रहा था। वोटबैंक की राजनीति में अपने जातीय वोटबैंक की अहमियत को समझते हुए नयी पीढ़ी के इस नेतृत्व ने जातीय आकांक्षाओं को लक्षित करने के लिए सामाजिक न्याय की समाजवादी राजनीति को अपना एजेंडा बनाया। ऐसी स्थिति में कर्पूरी ठाकुर की राजनीति का अप्रासंगिक होना स्वाभाविक था क्योंकि वे जिस नाई जाति से आते थे, उसकी आबादी बिहार में इतनी कम थी कि उसकी बदौलत राजनीति कर पाना, या फिर राजनीति में टिके रह पाना मुश्किल था, और जिस वर्ग की बदौलत वे अबतक राजनीति करते रहे, वह वर्ग तेजी से उनसे छिटक रहा था। यही कारण है कि अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में वे पिछड़ी जातियों के नयी पीढ़ी के नेतृत्व (लालू-नीतीश) के साथ—साथ दलितों की नयी पीढ़ी के नेतृत्व (राम विलास पासवान) के भी निशाने पर आते चले गए। संक्षेप में कहें, तो उनकी आरक्षण-नीति ने उन्हें एक साथ वर्चस्वशाली सवर्ण एवं मध्यवर्ती जातियों, दोनों के निशाने पर लाने का काम किया और इसलिए उन्हें दोनों की नाराज़गी झेलनी पड़ी।

विश्लेषण:

स्पष्ट है कि कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में व्यापक नज़रिए के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति, जिसमें सामाजिक न्याय का प्रश्न आर्थिक न्याय और लैंगिक न्याय के प्रश्न से सम्बद्ध था, की ठोस नींव रखी। यही कारण है कि कर्पूरी ठाकुर को जल्द ही सामन्तों ने अपने निशाने पर ले लिया जिसका संकेत 1980 के दशक में बिहार के ग्रामीण इलाकों में गहराते नक्सलवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि में उठने वाले इस नारे से मिलता है: नक्सलबाड़ी कहाँ से आई, कर्पूरी की माई बिआई। कर्पूरी ठाकुर राजनीतिक परिदृश्य में आने वाले इन बदलावों को समझ रहे थे, और इसीलिए जून,1983 में उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता पर बल देते हुए आर्थिक क्रांति और सामाजिक क्रांति के लिए व्यापक स्तर पर संघर्ष का आह्वान किया। सन् 1988 में उन्होंने विभेदकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हाथों शोषण-उत्पीड़न के शिकार अति-पिछड़ों, हरिजनों और आदिवासियों के बिखराव पर निराशा प्रदर्शित करते हुए उनसे संगठित होने का आह्वान किया था और इसे सामाजिक न्याय की अनिवार्य पूर्व-शर्त के रूप में रेखांकित किया था। मतलब यह कि मध्यवर्ती जातियों की नाराज़गी उनके राजनितिक भविष्य पर भारी पड़ रही थी और इस बात को कर्पूरी ठाकुर भी समझ रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंने एक बार फिर से नए सिरे से अपना जनाधार तलाशने का असफल प्रयास किया।  

 

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