सामाजिक न्याय की राजनीति: पार्ट वन: डॉ. लोहिया और सामाजिक न्याय
सामाजिक न्याय की राजनीति: मण्डल-पूर्व परिदृश्य
पार्ट वन: डॉ. लोहिया और सामाजिक न्याय
प्रमुख
आयाम
1. वैकल्पिक राजनीतिक संभावनाओं की
तलाश
2. अम्बेडकरोत्तर युग में सामाजिक न्याय
3. जाति-तोड़ो आन्दोलन
4. सामाजिक न्याय की राजनीति का अंतर्विरोध
5.
सामाजिक न्याय का समावेशी
स्वरुप
6.
सामाजिक न्याय का व्यापक
दायरा
7.
सामाजिक न्याय की भाषा के
प्रश्न से सम्बद्धता
8.
विश्लेषण
वैकल्पिक
राजनीतिक संभावनाओं की तलाश:
गाँधीवाद की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आनेवाले डॉ.
राम मनोहर लोहिया उससे प्रभावित होने के बावज़ूद धीरे-धीरे उससे
दूर पड़ते चले गए और आलम यह रहा कि डॉ. अम्बेडकर के बाद उन्होंने गाँधी और
गाँधीवाद की तीव्रतम आलोचना की।
भारत में समाजवादी राजनीति की नींव डालने वाले प्रमुख नेताओं में से एक डॉ. लोहिया
ने आज़ादी के बाद पहली कैबिनेट में जगह को स्वीकार करने की बजाय एक अलग राजनीतिक लाइन
अख्तियार करते हुए वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की। इसी कोशिश के क्रम में उन्होंने डॉ. अम्बेडकर
को साधते हुए उनके सहयोग से काँग्रेस के बेहतर विकल्प की सम्भावनाओं को टटोलना
चाहा। डॉ. लोहिया की आकांक्षा थी कि अम्बेडकर केवल
दलितों के बजाय समस्त भारतीयों का नेतृत्व करें। इसके लिए सितम्बर,1956 में अम्बेडकर से उनके अखिल भारतीय अनुसूचित जाति
फेडरेशन के साथ लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी के बीच संभावित गठबंधन पर चर्चा भी की
गयी। इस सिलसिले में डॉ. अम्बेडकर से उनका
पत्राचार भी हुआ और डॉ. अम्बेडकर ने इसके प्रति सकारत्मक नजरिया भी अपनाया, लेकिन
इससे पहले कि इसे व्यावहारिक धरातल पर उतारा जाता, दिसम्बर,1956 में डॉ. अम्बेडकर
की मौत हो गयी। दरअसल वे
भारत की जाति-व्यवस्था को हर कीमत पर तोड़ने के हिमायती थे और इसी के लिए उन्होंने डॉ. अम्बेडकर से हाथ मिलाने की कोशिश भी
की। ध्यातव्य है कि डॉ. लोहिया खुद सवर्ण समुदाय (मारवाड़ी बनिया) से आते थे,
लेकिन उन्होंने अपनी जातिगत पहचान को मानने से इनकार करते हुए पिछड़ों के हक़ की
लड़ाई को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
अम्बेडकरोत्तर युग में सामाजिक न्याय:
स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की
राजनीति को दिशा प्रदान करने में समाजवादियों की भूमिका अहम् रही है। अम्बेडकरोत्तर
युग में उत्तर भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति को नेतृत्व प्रदान करने का श्रेय
जाता है समाजवादियों को। इसका आधार तैयार किया, 1930 के दशक में अम्बेडकरवाद के राजनीतिक-सामाजिक
उभार एवं पूना-पैक्ट और 1940 के दशक में उत्तर भारत में मध्यवर्ती जातियों के आन्दोलन
ने, जिसने उनके सामाजिक उभार की प्रक्रिया को तेज करते हुए उनके पक्ष में भू-स्वामित्व
की प्रकृति में परिवर्तन को सम्भव बनाया। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें 1960
के दशक में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ‘जाति-तोड़ो
आन्दोलन’ का नारा दिया।
जाति-तोड़ो आन्दोलन:
अबतक की चर्चा से यह स्पष्ट है कि डॉ. लोहिया की
प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय के प्रति थी और उनके सामाजिक न्याय का दायरा कहीं अधिक
विस्तृत था। इसी प्रतिबद्धता के कारण उन्होंने काँग्रेसी राजनीति
का हिस्सा बनाते हुए आज़ाद भारत के पहले कैबिनेट में अपनी जगह स्वीकार करने की बजाय विपक्ष की
राजनीति करने का निर्णय लिया और गरीबों के हक़ के
लिए ‘तीन
आना बनाम् छह आना’ की ऐतिहासिक बहस चलाई। 1960 के दशक में
काँग्रेस और ‘हिंदुस्तानी
वामपंथ’ के ब्राह्मणवादी चरित्र पर सवाल करते हुए उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के जरिए ‘जाति-छोड़ो,
जनेऊ-तोड़ो अभियान’
चलाया और इसके माध्यम से सामाजिक न्याय की राजनीति की ठोस बुनियाद रखी। उनका
यह मानना था कि कोई भी जाति-तोड़ो आंदोलन जातियों के नाश के लिए हो, न कि ब्राहमण,
क्षत्रिय और कायस्थ की बराबरी के लिए। इतना ही नहीं, उन्होंने ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ का
नारा देते हुए पहली दफा पिछड़ों के लिए आरक्षण की माँग की।
सामाजिक न्याय की राजनीति
का अंतर्विरोध:
ऐसा नहीं कि डॉ. लोहिया सामाजिक न्याय
की राजनीति के अंतर्विरोध से अपरिचित थे, प्रमाण
उनकी यह आशंका है कि निचली जातियों के प्रतिक्रियावादी तत्व: नव-ब्राह्मण एवं
नव-सामन्त उनके जाति-तोड़ो आन्दोलन की आड़ में आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं को
पृष्ठभूमि में ढ़केलते हुए इसका इस्तेमाल अपने स्वार्थ-साधन के लिए कर सकते हैं,
और पिछले पाँच दशकों का अनुभव यह बतलाता है कि उनकी यह आशंका बेजा भी नहीं थी।
शायद यही कारण है कि जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए उन्होंने न केवल ब्राह्मण-बनिया
की जनसंघी राजनीति की कड़ी आलोचना की, वरन् उस शूद्र राजनीति की भी आलोचना की जो परम्परागत
ब्राह्मणों एवं सामन्तों के अनुकरण में ही अपनी सार्थकता तलाशती है। इसलिए उन्होंने न तो अम्बेडकरवादी जलन की राजनीति का
समर्थन किया और न ही सत्ता पाने के लिए जगजीवन राम की समझौते की राजनीति का। उन्होंने जाति के प्रश्न की अनदेखी के
लिए न केवल कम्युनिस्टों की आलोचना की, वरन् उन्हें खारिज भी कर दिया।
सामाजिक न्याय का समावेशी स्वरुप:
उन्होंने
केवल जातिगत विभेद और छुआछूत के ही प्रश्न का विरोध नहीं किया, वरन् लैंगिक विभेद और
रंगभेद के खिलाफ भी आवाज़ उठायी। उन्होंने सामाजिक न्याय की
अवधारणा को लैंगिक विभेद के खिलाफ लड़ाई
के उपकरण में तब्दील करते हुए उसे लैंगिक समावेशन
तक विस्तार दिया। वे कहते हैं कि ‘एक
वयस्क मर्द और औरत के बीच वादाखिलाफी और बलात्कार के अलावा सारे सम्बन्ध जायज़ हैं।’ इस प्रकार उन्होंने लैंगिक मसले का राजनीतिकरण करते हुए इसे सामाजिक न्याय
के प्रश्न से ले जाकर सम्बद्ध कर दिया। उन्होंने रंग-भेद पर प्रहार करते हुए कहा कि चमड़ी के रंग
का उसकी सुंदरता से कोई लेना देना नहीं है। इसीलिए
उनका ‘सामाजिक न्याय’ अपने स्वरुप में समावेशी था जिसे जाति के दायरे तक सीमित
नहीं माना जा सकता है।
सामाजिक न्याय का व्यापक दायरा:
डॉ. लोहिया को इस बात का श्रेय
मिलना चाहिए कि आरंभिक दौर में ही उन्होंने सामाजिक न्याय के प्रश्न को आर्थिक
न्याय के प्रश्न से सम्बद्ध कर दिया। इसके लिए
उन्होंने न्यूनतम मजदूरी एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए मज़दूर और किसानों के ‘दाम बाँधो’ नाम से सड़क से संसद तक
संघर्ष का नेतृत्व किया।
सामाजिक न्याय की भाषा के प्रश्न
से सम्बद्धता:
इतना ही नहीं, उन्होंने भाषा के प्रश्न को जातीय वर्चस्व के प्रश्न से जोड़ते हुए
भारतीय भाषाओँ में पढ़ाई की आवश्यकता पर बल दिया। विश्वविद्यालयों में भारतीय
भाषाओं में पढ़ाई से लेकर संघ लोक सेवा आयोग सहित प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी एवं
अन्य भारतीय भाषाओं को परीक्षा का माध्यम बनाने हेतु शुरुआती लड़ाई डॉ. लोहिया ने
लड़ी और इस लड़ाई का परिणाम यह हुआ कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ को उनका हक़ कुछ
हद तक मिल पाया।
विश्लेषण:
स्पष्ट है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भारतीय
समाज और राजनीति को कहीं गहरे स्तर पर प्रभावित किया और विशेष रूप से उसमें
ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ पूरी मुखरता से आवाज़ उठायी, अब यह बात अलग है कि इस
कारण सवर्णों एवं वामपंथियों के वर्चस्व वाले भारतीय बौद्धिक जगत ने उन्हें और
उनके चिन्तन को हाशिये पर पहुँचाने की हरसंभव कोशिश की। वास्तविकता यह है कि उत्तर भारत की सामाजिक
संरचना एवं राजनीतिक संरचना में जो बदलाव आये हैं और आज उत्तर भारत का समाज एवं राजनीति
जैसी है, और इस तरह से इसका जो समावेशी स्वरुप, कुछ हद तक, उभरकर सामने आया है,
उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने का श्रेय बहुत हद तक डॉ. लोहिया को जाता है। इसीलिए उन्हें ‘साइलेंट
रिवॉल्यूशन का जनक’ भी कहा
जाता है। लेकिन, यहाँ पर इस बात को
भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि गैर-काँग्रेसवाद की राजनीति करने वाले लोहिया ने
दक्षिणपंथ के प्रति नरम रवैया अपनाते हुए मुख्यधारा में उसकी स्वीकृति का आधार
तैयार किया।
स्रोत-सामग्री:
1.
http://thewirehindi.com/21176/remembering-socialist-ram-manohar-lohia/
2. https://hindi.caravanmagazine.in/politics/great-indian-coalition-hindi
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