पोस्टल बैलट विवाद: बिहार विधानसभा-चुनाव,2020

 

पोस्टल बैलट विवाद

प्रमुख आयाम

1.  पोस्टल बैलेट: चुनावी दिशा-निर्देश:

a. पोस्टल बैलेट का प्रावधान

b. पोस्टल बैलेट की प्रक्रिया

c.  पोस्टल बैलट की गणना-प्रक्रिया

d. पोस्टल बैलट को अमान्य घोषित करने की प्रक्रिया

e. अदालत का विकल्प

f.   महागठबंधन का आरोप

g. चुनाव-आयोग का स्पष्टीकरण

2.  पोस्टल बैलट विवाद: बिहार विधानसभा चुनाव:

a. पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल

b. हार की पटकथा का लेखन चुनाव के पहले ही

c.  चुनावी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन

d. भारी मात्रा में पोस्टल बैलट को रद्द किया जाना

e. मतगणना के दौरान पोस्टल बैलट का मेनुपुलेशन

f.   व्यावहारिक समस्या:

3.  पोस्टल बैलट विवाद: विश्लेषण

 

 

पोस्टल बैलेट: चुनावी दिशा-निर्देश

पोस्टल बैलेट का प्रावधान:

चुनाव आयोग द्वारा ऐसे लोगों के लिए पोस्टल बैलेट की व्यवस्था की जाती है जो पोलिंग ड्यूटी पर तैनात होने की वजह से, या फिर किसी अन्य वज़ह से पोलिंग बूथ पर जाकर वोट नहीं कर पाते लेकिन, चुनाव में अगर आपकी ड्यूटी उसी विधानसभा सीट पर है, जिसके आप मतदाता है, पर पोलिंग बूथ अलग है, तो ऐसे सरकारी कर्मचारी पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल नहीं करते उनके लिए इलेक्शन ड्यूटी सर्टिफ़िकेट (EDC) का प्रावधान होता है विधानसभा चुनाव में इस बार चुनाव-आयोग ने तीन प्रकार के निर्वाचकों को पोस्टल बैलेट से मतदान करने की अनुमति दी है: अमूमन चार तरह के लोग वोट देने के लिए पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल कर सकते हैं:

1.  स्पेशल वोटर्स अर्थात् कोविड-19 संकट की पृष्ठभूमि में 80 साल से ज़्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, दिव्यांग(Persons with Disabilities) निर्वाचकों  और कोराना-संक्रमित मरीज,

  1. सर्विस-वोटर्स अर्थात् सेना के जवान,
  2. ऐसे वोटर, जो चुनावी-प्रक्रिया का हिस्सा हों और चुनाव में ड्यूटी पर तैनात हैं, और
  3. ऐसे वोटर, जो कुछ ख़ास कारणों से निवारक निरोध के प्रावधानों के तहत् नज़रबंद (Preventive Detention) हों

पोस्टल बैलेट की प्रक्रिया:

एक पोस्टल बैलेट की चार पर्चियाँ होती हैं:

1.  एक फॉर्म होता है, जिसमें मतदाता अपना वोट डालते हैं

2.  उसके साथ पहचान-पत्र के रूप में इस्तेमाल में लाया जाने वाला एक दूसरा फॉर्म होता है जिसे मताधिकार का प्रयोग करने वाले किसी सीनियर द्वारा साइन और प्रमाणित किया जा सकता है अगर कोई स्पेशल वोटर अपने उम्र का फ़ोटो पहचान-पत्र दिखाकर  किसी भी गैज़ेटेड ऑफ़िसर से साइन करवा कर इसे भर सकता है

3.  इसके ऊपर एक तीसरा कवर होता है, जो रिटर्निंग ऑफिसर के नाम भेजा जाता है

4.  चौथा पर्चे में पोस्टल बैलेट इस्तेमाल करने के पूरे नियम लिखे होते हैं

आयोग ने ऐसे वोटरों के घर पर बीएलओ को भेजकर फॉर्म 12 डी उपलब्ध कराते हुए पोस्टल बैलट से मतदान हेतु उनकी सहमती हासिल करने और बीएलओ के माध्यम से फॉर्म को रिटर्निंग ऑफिसर के पास जमा कराने का आदेश दिया। चुनाव-आयोग के दिशानिर्देशों के अनुरूप, यह सहमति हर हाल में अधिसूचना जारी करने की तिथि से 5 दिनों के अंदर प्राप्त कर लेनी है। यहाँ पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यदि किसी मतदाता ने फॉर्म 12 डी के माध्यम से पोस्टल बैलट से मतदान हेतु सहमति व्यक्त कर दी है, तो वह मतदान-केन्द्र पर मतदान के योग्य नहीं होगा और उसे मतदान केन्द्र पर मतदान की अनुमति नहीं होगी। चुनाव-आयोग का दावा है कि बूथ लेवल ऑफिसर(BLO) ने पोस्टल बैलट के सिलसिले में करीब सोलह लाख से अधिक वोटरों तक पहुँचने की कोशिश की।

पोस्टल बैलट की गणना-प्रक्रिया:

चुनाव-आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक़, पोस्टल बैलेट की गिनती वोटों की गिनती की शुरुआत में होना चाहिए पूर्व मुख्य निर्वाचन-आयुक्त ओ. पी. रावत कहते हैं, “अगर आधे घंटे में पोस्टल बैलेट की गिनती पूरी नहीं होती, तो ईवीएम के वोटों की भी शुरू हो जानी चाहिए और दोनों गिनती साथ-साथ चल सकती है

चुनाव-आयोग के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए ओ. पी. रावत कहते हैं, “अगर अमान्य पोस्टल बैलेट की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा होते हैं, तो नियमों के मुताबिक़ रिटर्निंग ऑफ़िसर दूसरे ऑब्ज़र्वर के साथ काउंटिंग एजेंट के सामने दोबारा से उन पोस्टल बैलेट को वैरिफाई करें, काउंटिंग करें और दोबारा पुराने नंबर से टैली भी करें अगर ऐसा करने पर थोड़ी-भी गड़बड़ी मिले, तो दूसरे सभी उम्मीदवारों के लिए ऐसा करना अनिवार्य होता है इसके अलावा भी, अगर किसी उम्मीदवार को इनकी गणना के दौरान ज़रा-सा भी शक हो, तो वे मतगणना-केन्द्र पर ही रिटर्निंग ऑफ़िसर के सामने इनकी दोबारा गणना की माँग कर सकते हैं।” आगे वे कहते हैं कि अगर किसी उम्मीदवार या उसके प्रतिनिधि के द्वारा पोस्टल बैलट की दोबारा मतगणना की माँग की जाती है, तो इसकी अनुमति देना या न देना रिटर्निंग ऑफ़िसर के अधिकार-क्षेत्र में आता है इसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं होती है

पोस्टल बैलट को अमान्य घोषित करने की प्रक्रिया:

अगर इनमें से कोई भी फ़ॉर्म जारी दिशा-निर्देशों से अलग तरीके से भर दिया जाता है, तो उस पोस्टल बैलेट को अमान्य घोषित किया जाता है जैसे: सही तरह से पोस्टल बैलेट को प्रमाणित न किया जाना, सही लिफ़ाफे में बंद न करना, साइन ग़लत जगह करना, इनमें से किसी पर्ची को ख़ाली छोड़ दिया जाना आदि रिटर्निंग ऑफ़िसर पोस्टल बैलेट को सभी काउंटिंग एजेंट को दिखा कर ही अमान्य करार दे सकता है पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत के अनुसार, अमान्य पोस्टल बैलेट पर चुनाव आयोग के निर्देश साफ़ कहते हैं कि अगर आपने वोट सही भी दिया हो, लेकिन पहचान-पत्र या दूसरे फॉर्म को सही तरीक़े से नहीं भरा गया हो, तब भी आपका पोस्टल बैलेट अमान्य होगा

अदालत का विकल्प:

अगर कोई उम्मीदवार मतगणना से संतुष्ट नहीं है, तो कोई भी उम्मीदवार चुनाव में धांधली के आरोप पर सबूतों के आधार पर कोर्ट में चुनावी याचिका दायर कर सकता है जिसने चुनाव नहीं लड़ा है, वो अदालत की शरण नहीं ले सकता है

महागठबंधन का आरोप:

चुनाव-नतीजे आने के बाद महागठबंधन में शामिल घटक दल: आरजेडी, लेफ्ट और काँग्रेस ने पोस्टल बैलट की गणना के दौरान धांधली का आरोप लगाते हुए कहा कि वोटों की गिनती के दौरान आयोग ने जिन पोस्टल बैलेट को अमान्य घोषित कर दिया था, उसी में महागठबंधन की जीत-हार का अंतर छिपा है। राजद ने चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए कहा कि एक तो पोस्टल बैलेट को पहले नहीं गिना गया, और दूसरे, कई जगह पर इन्हें ग़लत तरीके से अमान्य बताया गया। इसी आलोक में उसने उन पोस्टल बैलेट की दोबारा गिनती की माँग की जहाँ इन्हें अंत में गिना गया। ध्यातव्य है कि चुनाव आयोग ने 243 सीटों के जो आँकड़े साझा किए हैं, उसमें सिर्फ 11 सीटों पर जीत-हार का अंतर 1,000 से कम वोटों का रहा है।

चुनाव-आयोग का स्पष्टीकरण:

बिहार-चुनाव में वोटों की गिनती के दौरान धांधली के आरोपों को चुनावों आयोग ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नजदीकी मुकाबले वाले ग्यारह सीटों में चार सीटें जेडीयू, तीन आरजेडी और एक-एक सीटें भाजपा, सीपीआई, लोजपा और एक निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई है। उनके मुताबिक कम मार्जिन वाली बाकी 10 सीटों के उम्मीदवारों ने भी दोबारा काउंटिंग की माँग की थी, लेकिन रिटर्निंग ऑफिसरों ने इसलिए उनकी माँग यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जीत-हार का अंतर अमान्य ठहराए गए पोस्टल बैलेट से ज्यादा था। इन ग्यारह स्थान पर 6 निर्वाचन-क्षेत्रों में रीकाउंटिंग की माँग की गयी, लेकिन इस माँग को खारिज कर दिया गया चुनाव आयोग का यह कहना है कि सिर्फ नालंदा जिले की हिलसा विधानसभा सीट पर जीतने वाले उम्मीदवार और पराजित उम्मीदवार के बीच हार का अंतर ही अमान्य ठहराए गए पोस्टल बैलेट की संख्या से कम था। बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एच. आर. श्रीनिवास का कहना है कि राजद प्रत्याशी के अनुरोध पर सभी पोस्टल बैलेटों की दोबारा गिनती की गई, लेकिन दोबारा गिनती के बाद भी वही नतीजे मिले।

सर्टिफिकेट देने में देरी के आरोपों के सन्दर्भ में चुनाव आयोग ने कहा, “जब ईवीएम की गिनती खत्म हो जाती है, रैंडमली पाँच ईवीएम को चुनकर वीवीपैट स्लिप से ईवीएम वोटों का मिलान किया जाता है जिसमें समय लगता है।” आगे, चुनाव-आयोग ने यह भी कहा, “उस स्थिति में ईवीएम वोटों का मिलान वीवीपैट स्लिप से करवाया जाता है, जब कंट्रोल यूनिट परिणाम नहीं दिखाता है या जब पोलिंग ऑफिसर मॉक पोल मिटाना भूल जाता है।” इसलिए ईवीएम की गिनती पूरी होने के बावजूद जबतक कि वीवीपैट स्लिप का मिलान ना कर लिया जाए और सभी पोलिंग स्टेशनों के आँकड़ों को चुनाव-आयोग के सॉफ्टवेयर में न डाल दिया जाए, तब तक औपचारिक रूप से परिणाम घोषित करने से परहेज़ किया जाता है। इतना ही नहीं, चूँकि इस बार चुनाव आयोग ने पोस्टल बैलेट के दायरे का विस्तार किया, इसलिए इसकी संख्या में इजाफा हुआ और इसी वज़ह से पोस्टल बैलट की मतगणना में ज्यादा वक़्त लग गया होजीतने वाले उम्मीदवारों को सर्टिफिकेट देने में देरी के यही कारण हैं।

 

पोस्टल बैलट विवाद: बिहार विधानसभा चुनाव

पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल:

बिहार विधानसभा-चुनाव के पहले चरण में 71 विधानसभा सीटों पर सम्पन्न चुनावों में में 4 लाख से अधिक वोटरों में से सिर्फ 52 हजार (करीब 8 फीसदी) ही ऐसे मतदाता हैं जो पोस्टल बैलेट से वोटिंग करना चाहते हैं। चुनाव आयोग ने कुल 16 लाख मतदाताओं को लक्षित कर वहाँ तक पहुँचते हुए उन्हें पोस्टल बैलट का विकल्प देने का दावा किया। अंतिम परिणामों पर नज़र डालें, तो पोस्टल बैलट में महागठबंधन को करीब 1.19 लाख वोट मिले, जबकि राजग गठबंधन को महज 62,151 वोट। इनमें राजद को 72,898 वोट, काँग्रेस को 31,236 वोट और लेफ्ट को 14,875 वोट मिले। उधर, भाजपा को 30,595 वोट, जनता दल यूनाइटेड को 27,432 वोट, हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा को 2,232 वोट और विकासशील इंसान पार्टी को 1892 वोट मिले। इसमें 1,641 मत नोट के पक्ष में गए, तो 11,380 मत लोजपा के पक्ष में। लेकिन, हाल में सम्पन्न बिहार विधानसभा चुनाव में पोस्टल बैलट ने कई विवादों को जन्म दिया है और प्रमुख विपक्षी दल राजद और उसके गठबंधन सहयोगियों के द्वारा यह आरोप लगाया जा रहा है कि पोस्टल बैलट के मेनुपुलेशन के ज़रिये चुनाव-परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश की गयी और उसे बदला गया। इसके आलोक में इस प्रश्न पर गंभीर से विचार की आवश्यकता है।

हार की पटकथा का लेखन चुनाव के पहले ही:

जिस तरीके से पोस्टल बैलट और मतदान की प्रक्रिया को दिशानिर्देशित करने के प्रयास किये गए, वे इस बात को दर्शाते हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन को चुनावी हार की आशंका थी और इसीलिए उसने नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर अपनी बढ़त को सुनिश्चित करने की व्यापक रणनीति तैयार कर रखी थी और उसे व्यावहारिक अंजाम दिया गया। इसे अलग-अलग कैटेगरी के वोटर्स के सन्दर्भ में निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:

1.    स्पेशल कैटेगरी वोटर्स का सन्दर्भ: इस बार चुनाव-आयोग ने बुजुर्गों, दिव्यांगों और कोरोना-मरीजों के लिए पोस्टल बैलट से मतदान की सुविधा उपलब्ध करवाई स्पेशल कैटेगरी के इन वोटर्स के सन्दर्भ में सरकार ने सत्तारूढ़ दल को बुजुर्गों एवं दिव्यांगों की सूची बहुत पहले ही उपलब्ध करवा दी गयी स्थानीय स्तर पर सत्तारूढ़ दल के कैडरों ने प्रखण्ड विकास पदाधिकारी या बूथ लेवल ऑफिसर(BLO), जो भी इनके प्रति नरम थे, उन्हें विश्वास में लेते हुए यह सुनिश्चित किया कि सत्तारूढ़ दल के विरोधियों को पोस्टल बैलट के ज़रिए वोटिंग के विकल्प से वंचित रखा जाए और इस प्रकार मतदान केन्द्रों पर जाकर वोटिंग के अलावा कोई दूसरा विकल्प उनके पास शेष नहीं रह गया चूँकि कोई मतदाता पोस्टल बैलट के ज़रिये मतदान के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं, यह जिम्मेवारी बूथ लेवल ऑफिसर(BLO) को सौंपी गयी, इसलिए इस व्यवस्था के तहत् पोस्टल बैलट के विकल्प को सत्तारूढ़ दलों के समर्थन वाले पॉकेट में ही उपयुक्त पाया गया, और अन्य लोगों के सन्दर्भ में मतदान केन्द्रों पर जाकर वोटिंग करने की बात की गयी इसके ज़रिए यह सुनिश्चित किया गया कि इनके समर्थक मतदाता पोस्टल बैलट के ज़रिये मतदान करने में सक्षम हो सकें और विरोधी दलों के मतदाताओं को रोका जा सके।

इतना ही नहीं, बूथ लेवल ऑफिसर(BLO) के द्वारा चिन्हित मतदाता-सूची सत्तरूढ़ दल के उम्मीदवारों को उपलब्ध करवाई गयी और उनको विश्वास में लेते हुए मतदान करवाया गया। इस क्रम में विशेष रूप से यादव और मुस्लिम मतदाताओं को लक्षित किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में कहीं रिटर्निंग ऑफिसर(RO), तो कहीं प्रखण्ड विकास पदाधिकारी-सह-एडिशनल रिटर्निंग ऑफिसर, कहीं बूथ लेवल ऑफिसर(BLO) और कहीं-कहीं तो रिटर्निंग ऑफिसर(RO) के कार्यालय में तैनात कंप्यूटर ऑपरेटर ने भी इसे अंजाम दिया। यदि इन सबके बावजूद विरोधी दलों के समर्थक मतदाताओं को पोस्टल बैलट के उपयुक्त पाया गया, तो उन्हें मतदान के समय गाँव से बाहर, अनुपस्थित या मृतक दर्शाते हुए मतदान के अधिकार से वंचित रखा गया।

2.  मतदानकर्मियों के सन्दर्भ में पोस्टल बैलट का मेनुपुलेशन: जहाँ तक मतदानकर्मियों के द्वारा पोस्टल बैलट के इस्तेमाल का प्रश्न है, तो:

a.  सुविधा-केन्द्रों पर मनमाने तरीके से जाति एवं धर्म को देखकर उन मतदाताओं के नाम हटाये गए जिनके बारे में यह धारणा थी कि वे सरकार के विरुद्ध वोटिंग करेंगे।

b.  चुनाव-आयोग के प्रावधानों और दिशानिर्देशों के बावजूद इन सुविधा-केन्द्रों पर वोटिंग से पहले विपक्षी दलों को इस सन्दर्भ में सूचना नहीं दी गयी, जबकि नियमतः सभी राजनीतिक दलों को इसकी सूचना दी जानी चाहिए थी और उनके पोलिंग-एजेंट की उपस्थिति में वोटिंग करवाया जाना था।

c.  पोलिंग एजेंट, पुलिस बल, दंडाधिकारी आदि की अनुपस्थिति में वोटिंग करवाया गया।

d.  सबसे पहले प्रशिक्षण को आए शिक्षक-गण, जिन्होंने फॉर्म 12 डी भरा था, उन सभी को वोट नहीं डालने दिया गया

e.  ऐसी भी ख़बरें हैं कि प्रखंड-स्तरीय (अराजपत्रित अधिकारी) को प्रमाणीकरण का अधिकार दिया गया और उन्होंने बिना किसी ठोस जाँच-पड़ताल के लोगों को वोटिंग करने दिया। ऐसी परिस्थिति में बोगस वोटिंग की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

चुनावी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन:

विपक्षी दलों के द्वारा मतगणना के दौरान चुनाव-आयोग के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए पूरी-की-पूरी मतगणना के मेनुपुलेशन का आरोप सत्तारूढ़ गठबंधन पर लगया जा रहा है। इन आरोपों के सन्दर्भ में देखें, तो निम्न सन्दर्भों में मतगणना के दौरान विशेष रूप से चुनाव-आयोग के दिशानिर्देशों का उल्लंघन हुआ है:

1.  मतगणना के पहले चुनाव-आयोग के द्वारा ऑब्जर्वर को पोस्टल बैलट के संदर्भ में जानकारी उपलब्ध नहीं करवाना: चुनाव-आयोग के दिशानिर्देशों में यह अपेक्षा की गयी है कि रिटर्निंग ऑफिसर के द्वारा मतगणना से एक दिन पहले पोस्टल बैलट से प्राप्त सभी मतों की जानकारी ऑब्जर्वर को दी जानी चाहिए। लेकिन, अधिकांश जगहों पर चुनाव-आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के द्वारा ऑब्जर्वर को ऐसी कोई भी जानकारी नहीं उपलब्ध करवाई गयी।

2.  पोस्टल बैलट की गिनती आरम्भ में न करके बाद में शुरू करना: निर्वाचन-आचरण नियमावली,1961 की धारा 54A (रिटर्निंग ऑफिसर की पृष्ठ संख्या 257) के अनुसार, पोस्टल बैलट की गिनती पहले होनी चाहिए और इस गिनती के शुरू होने के बाद ही ईवीएम के मतों की गिनती होगी। लेकिन, हाल में सम्पन्न बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान होने वाली मतगणना के क्रम में अधिकांश जगहों पर पोस्टल बैलट की गिनती बाद में शुरू हुई और इस गिनती को जान-बूझ कर धीमा रखा गया। 

3.  पोस्टल बैलट की गिनती के सन्दर्भ में प्रक्रियागत दिशानिर्देशों की अनदेखी: चुनाव-आयोग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक एक टेबल पर 500 पोस्टल बैलट की ही गणना की जा सकती है। पोस्टल बैलट की संख्या जितनी ज्यादा होगी, उसी अनुपात में टेबल की व्यवस्था भी होगी और हर टेबल पर एक एडिशनल रिटर्निंग ऑफिसर(ARO) की मौजूदगी को सुनिश्चित किया जाएगा। काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट के रूप में केवल राजपत्रित अधिकारी को लगाने का प्रावधान है। लेकिन, हालिया मतगणना के दौरान कई स्थानों पर एक ही टेबल लगायी गयी जिसके कारण अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई। साथ ही, राजपत्रित अधिकारियों की जगह निचले स्तर के अराजपत्रित अधिकारियों को पोस्टल बैलट की गणना में शामिल किया गया और उनकी सहायता से पोस्टल बैलट की गणना सम्पन्न करवाई गयी।

4.  अंतिम दो राउंड की ईवीएम मतगणना पोस्टल बैलट की गिनती पूरा होने के बाद ही: निर्वाचन आयोग के नियमों [रिटर्निंग ऑफिसर हैण्डबुक पेज 258 (15.15.4.9)] के अनुसार, ईवीएम वोटों की अन्तिम राउंड से पहले वाले राउंड की गणना तब तक नहीं की जायेगी, जब तक कि पोस्टल बैलट वाली गिनती पूरी नहीं हो जाती है। हालिया चुनाव में चुनाव आयोग के इस निर्देश की भी अनदेखी की गयी है। ऐसे कई विधानसभा क्षेत्रों में जहाँ भी अन्तर 1,000 से कम है, वहाँ पोस्टल बैलट की गिनती अन्तिम राउंड के बाद की गयी है जो नियमों के विपरीत है।

5.  हार-जीत का अन्तर पोस्टल बैलट से कम होने पर अनिवार्य पुनर्मतगणना का प्रावधान: निर्वाचन-आयोग के नियमों (रिटर्निंग ऑफिसर हैण्डबुक पेज 260, पारा 15) के अनुसार, अगर किसी भी क्षेत्र में जीत-हार का अन्तर पोस्टल बैलट की संख्या से कम है, तो पोस्टल बैलट की अनिवार्यतः फिर से जाँच होगी और उनकी दोबारा गणना की जाएगी। ऐसी सूचना मिली है कि कई जगहों पर इस निर्देश का भी अनुपालन नहीं हुआ है।

निश्चय ही इन तमाम सन्दर्भों में चुनाव-आयोग की चुप्पी उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करती है। सवाल महागठबंधन की हार और जीत का नहीं है, सवाल है चुनावी-प्रक्रिया और इसे सम्पन्न करवाने वाली संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता का, और इस प्रश्न की अनदेखी का मतलब होगा लोकतंत्र को खतरे में डालना।

भारी मात्रा में पोस्टल बैलट को रद्द किया जाना:

जिस तरह से इस बार भारी संख्या में मतदाताओं ने सुविधा-केन्द्रों पर मतदान किया और कई विधानसभा क्षेत्रों में हार-जीत के फैसला दो या तीन अंकों के अंतर से हुआ, उसको देखते हुए कई विधानसभा क्षेत्रों में पोस्टल बैलट काफी निर्णायक साबित हुए। ऐसी स्थिति में पढ़े-लिखे प्रशिक्षित मतदाताओं के पोस्टल बैलटों को भारी मात्रा में रद्द किया जाना सन्देह पैदा करता है। किसी विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र में 900 पोस्टल बैलट को रद्द किया गया, तो किसी विधानसभा निर्वाचन-क्षेत्र में 700 पोस्टल बैलट को। ऐसा किया जाना पूरी-की-पूरी निर्वाचन-प्रक्रिया को सन्देह के घेरे में लाकर खड़ा कर देता है क्योंकि ये सारे पढ़े-लिखे मतदाता हैं और इन्हें मतदान के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया है। ऐसी परिस्थिति में अगर ये अपना वोट तक ठीक से नहीं डाल सकते हैं, तो उनसे इस बात की कैसे उम्मीद की जाए कि वे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया के सञ्चालन में समर्थ होंगे।

मतगणना के दौरान पोस्टल बैलट का मेनुपुलेशन: 

जब पोस्टल बैलट में फॉर्म 13C, जिसे आउटर इनवेलप एवं कवर बी भी कहा जाता है, को खोला जाता है, तो उसके अन्दर दो चीजें होती हैं:

1.  फॉर्म 13A में मतदाता की उद्घोषणा, और

2.  फॉर्म 13B, जो पोस्टल बैलट को समाहित करता है।

दरअसल, इसी लिफाफे को खोलने के क्रम में फॉर्म 13B से जैसे ही इस बात का संकेत मिलता है कि यह मत विरोधी दलों के उम्मीदवार के पक्ष में है, तो बड़ी ही चालाकी से मतदाता की उद्घोषणा से सम्बंधित फॉर्म 13A को नीचे गिराकर गायब कर दिया जाता है, या नज़रें बचाकर पोस्टल बैलट पर कलम से एक लाइन खींच दी जाती है, या फिर बड़ी ही चालाकी से दूसरे उम्मीदवार के नाम के आगे दोबारा टिक-मार्क लगा दिया जाता है, ताकि वह पोस्टल बैलट रद्द हो जाए। कई बार स्टाम्प पैड की स्याही ही कहीं लगा दिया जाता है, ताकि उसे रद्द कर दिया जाए। ये तरीके अक्सर कम मार्जिन वाली सीटों पर अपनाये जाते हैं और इसके ज़रिये विपक्षी दलों के उम्मीदवारों की हार को सुनिश्चित किया जाता है। ध्यातव्य है कि सबसे अधिक मत-पत्र उन लोगों के रद्द किये गए जो मतदानकर्मी थे और जिन्हें मतदान के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था और जिन पर चुनाव करवाने की जिम्मेवारी थी 

व्यावहारिक समस्या:

पोस्टल बैलट के सन्दर्भ में व्यावहारिक समस्या यह है कि इस सन्दर्भ में उम्मीदवारों में जानकारी एवं जागरूकता के अभाव की भी है। न तो उनके पास जानकारी होती है और न ही जानकारी हासिल करने में रूचि होती है। यह समस्या सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल, दोनों के उम्मीदवारों के साथ होती है, पर सत्तारूढ़ दल अक्सर इस स्थिति को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करता है। इतना ही नहीं, सामान्यतः काउंटिंग एजेंट पोस्टल बैलट के तकनीकी पहलुओं से अनभिज्ञ होते हैं, और कई बार अधिक भीड़-भाड़ के कारण वे पोस्टल बैलट को ठीक तरीके से देख भी नहीं पाते हैं।

पोस्टल बैलट विवाद: विश्लेषण

पोस्टल बैलट के सन्दर्भ में उत्पन्न विवादों ने चुनावी प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव-आयोग की साख एवं विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है, और लोकतंत्र के भविष्य, चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता और चुनाव-आयोग की साख एवं विश्वसनीयता के मद्देनज़र  आवश्यकता इस बात की है कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग अपनी जिम्मेवारियों को स्वीकार करे, लेकिन यह तबतक सम्भव नहीं है जब तक कि आयोग इस बात का जवाब नहीं देता है कि क्यों और किन परिस्थितियों में गाइडलाइन्स के विपरीत पोस्टल बैलट की गणना बाद में करने की अनुमति दी गयी, और क्यों भारी मात्रा में पोस्टल बैलट रद्द किये गएइतना ही नहीं, एक बार जब जीत की घोषणा के साथ काउंटिंग की प्रक्रिया समाप्त हुई और विजयी उम्मीदवार को सर्टिफिकेट के लिए प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया, तो अचानक रीकाउन्टिंग की प्रक्रिया कैसे शुरू की गयी और कैसे परिणाम बदले गए? यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखे जाने की ज़रुरत है कि चुनाव आयोग के सिर्फ कह देने से नहीं होगा, ज़मीनी स्तर पर जो परेशानियाँ महसूस की गयी हैं, न तो उनकी अनदेखी की जा सकती है और न ही उनकी अनदेखी की जानी चाहिएआवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग बिहार विधानसभा चुनाव में पोस्टल बैलेट से सम्बंधित सभी आँकड़ों: कटने लोगों के द्वारा पोस्टल बैलट का इस्तेमाल किया गया, उनमें से कितने पोस्टल बैलट को अवैध घोषित किया गया और क्यों, इनमें कुल कितने पोस्टल बैलट वैध पाए गए और कितने पोस्टल मत किन-किन उम्मीदवारों को मिले, इससे सम्बंधित आँकड़ों का सीटवार-विवरण उपलब्ध करवाना चाहिए, ताकि विद्यमान आशंकाओं का निवारण हो और चुनाव आयोग के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया में लोगों भरोसा बढ़े

जहाँ तक राजद और महागठबंधन के विरोध का प्रश्न है, तो अगर महागठबंधन के उम्मीदवार या उनके काउंटिंग एजेंट काउंटिंग के परिणामों से संतुष्ट नहीं था, तो क्यों नहीं उन्होंने वहीं पर अपना विरोध प्रदर्शित किया और काउंटिंग दस्तावेजों पर हस्ताक्षर से इनकार किया? अगर राजद अपने आरोपों को लेकर वाकई गम्भीर है और चुनाव-आयोग उसकी आपत्तियों का निराकरण नहीं कर रहा है, तो उसे अदालत की ओर रुख करना चाहिए

स्पष्ट है कि अगर चुनाव-परिणामों को लेकर कोई आशंका है, तो यह लड़ाई लोकतांत्रिक तरीक़े से लड़ी जानी चाहिए और इसके लिए अदालत के दरवाज़े खटखटाए जाएँ। सड़क पर अराजकता इसका समाधान नहीं है। और, चुनाव-आयोग ऐसे मामलों को गम्भीरता से लेते हुए इसका निराकरण करे, और ऐसे आरोपों के ग़लत पाए जाने पर ऐसे राजनीतिक दलों एवं उसके नेतृत्व के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करे, लेकिन ऐसा करना तब संभव होगा जब अपने मोर्चे और अपनी भूमिका को लेकर वह खुद दुरुस्त हो।

 

 

 

 

 

 

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