बिहार के लिए सन्देश: ‘बैक टू द बेसिक्स’ (बिहार विधानसभा चुनाव पार्ट वन )
‘बैक टू द बेसिक्स’
बिहार के
लिए सन्देश
क्रिकेट में जब कोई भी बल्लेबाज आउट ऑफ़ फॉर्म चल
रहा होता है, तो उसे एक ही सन्देश दिया जाता है, और वह सन्देश है: ‘Back To The Basics’। इसका मतलब
यह है क्रिकेट के एबीसीडी की ओर लौटना और एक नयी शुरुआत करते हुए अपने खोए हुए फॉर्म
को हासिल करना। यह ‘बैक टू द बेसिक्स’ क्रिकेट ही नहीं, हर संकट का समाधान है। आइए,
अब हम उस मूल मसले पर लौटते हैं जिसका समाधान ‘बैक टू द बेसिक्स’ में अन्तर्निहित
है। हमारी आज की चर्चा का सन्दर्भ है बिहार विधानसभा-चुनाव,2020।
लालू-नीतीश-रामविलास के दुष्चक्र
में फँसा बिहार:
आज बिहार संकट में है और यह संकट है ‘विकास का संकट’, जिसके मूल में
है राजनीति और उस राजनीति के प्रति बिहार के मतदाताओं का रवैया। बिहार पिछले तीन
दशकों से सामाजिक न्याय की राजनीति के दुष्चक्र में फँसा हुआ है, और इस दुष्चक्र
को निर्मित किया है लालू-नीतीश-रामविलास की तिकड़ी ने। इस तिकड़ी से बिहार को जो कुछ
मिलना था, वह बिहार को मिल चुका है, और अब यह तिकड़ी बिहार के लिए बोझ बन चुकी है। अब
ये ऐसे ‘बासी माल’ में तब्दील हो चुके हैं जिसकी कोई उपयोगिता भी नहीं है, और ये
जबतक घर में रहेंगे, दुर्गन्ध फैलाते रहेंगे। जरा इस तिकड़ी के विज़न पर भी गौर कर
लिया जाए। नीतीश सत्ता में बने रहने के लिए अपनी समस्त ‘राजनीतिक पूँजी’ लुटा चुके
हैं, और येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना ही उनका लक्ष्य रह गया है, अब उसके
लिए चाहे जिससे समझौता करना पड़े और उसके लिए चाहे जितना गिरना पड़े। यहाँ पर मैं यह
स्पष्ट कर दूँ कि राजनीति की मेरी समझ कहती है कि ‘नाउ नीतीश इज पॉलिटिकली डेड’।
और, मैं इस निष्कर्ष पर सन् 2015-16 में पहुँचा, और इस पर अंतिम रूप से मुहर तब
लगी जब नीतीश जी ने महागठबंधन से अलग होकर एक बार फिर से भाजपा के साथ मिलकर सरकार
बनाई। मैं एक बार फिर से अपनी बात दोहराना चाहूँगा, ‘नीतीश हैज आलरेडी बीन
पॉलिटिकली फिनिश्ड’। भले वे एक बार फिर से मुख्यमन्त्री बनने में कामयाब रहें, पर
बस वे कुर्सी पर बैठे दिखेंगे, और तभी तक बैठे दिखेंगे, जबतक भाजपा चाहेगी और जबतक
भाजपा की ज़रुरत हैं। और, अब वह ज़रुरत समाप्त होती दिख रही है। नीतीश आज पूरी तरह
से भाजपा की गिरफ्त में कसमसा रहे हैं, और उन्हें इसका अहसास है, तभी तो वे भी
पुष्पम प्रिया चौधरी और प्लुरल्स के माध्यम से भाजपा को भी घेरने की कोशिश में लगे
हुए हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार भाजपा एक ओर तेजस्वी यादव एवं राजद के माध्यम
से और दूसरी ओर चिराग पासवान एवं लोजपा के माध्यम से नीतीश को ज़बरदस्त तरीके से
घेर चुकी है। आज तेजस्वी और चिराग भाजपा के दो मोहरे हैं जिसके जरिये उसने नीतीश
की ऐसी घेराबन्दी की है जिससे निकलना आसान नहीं होने जा रहा। उधर, सामाजिक न्याय
की राजनीति के दो चेहरे लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान अपने-अपने बेटे
क्रमशः तेजस्वी यादव और चिराग पासवान को सेट करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
लेकिन, अगर बिहार के विशेष सन्दर्भ में सामाजिक न्याय की राजनीति की विडंबना की
बात करूँ, तो या तो यह बुरी तरह से वंशवाद और राजनीतिक भ्रष्टाचार की गिरफ्त (राजद)
में दिखेगी, या साम्प्रदायिकता की गिरफ्त में (जदयू), या फिर इन दोनों की गिरफ्त
में (लोजपा)। इसी का फायदा बिहार में दक्षिणपंथ ने उठाया है और समाजिक न्याय की
राजनीति के अंतर्विरोधों का फायदा उठाते हुए उसने लगातार अपनी स्थिति मज़बूत की है
और इतनी मज़बूत की है कि आज तीनों उसके सामने बेबस नज़र आ रहे हैं। इसलिए मैंने यह
कहा कि विकास के लिए बिहार को इन तीनों की गिरफ्त से बाहर निकलना होगा, जबतक ऐसा
नहीं होता है, तबतक बिहार का विकास मुश्किल है। भाजपा के लिए इससे मुफीद स्थिति
क्या हो सकती है कि वह दिल्ली में बैठकर बिहार की राजनीति को हैंडल कर रही है, और
यहाँ तक कि भाजपा बिहार के चुनाव-प्रभारी धर्मेन्द्र यादव के माध्यम से तेजस्वी
यादव और उनके राजद की राजनीति भी हैंडल कर रहे हैं।
धर्म एवं सम्प्रदाय के दुष्चक्र में
फँसने की ओर अग्रसर बिहार:
उपरोक्त चर्चाओं से इतना तो स्पष्ट है कि सामाजिक न्याय की राजनीति के
बिखराव की पृष्ठभूमि में बिहार राजनीतिक संक्रमण की ओर तेजी से बढ़ रहा है, और ऐसा
प्रतीत हो रहा है दक्षिणपंथ की साम्प्रदायिक राजनीति उसे प्रतिस्थापित करने के लिए
प्रस्तुत है। पर, अभी वह इस स्थिति में नहीं है कि वह अपने दम पर इसे प्रतिस्थापित
कर सके, इसलिए इसने सामाजिक न्याय की राजनीति की बैसाखी थाम ली है। आने वाले समय
में अगर दक्षिणपंथ की साम्प्रदायिक राजनीति ऐसा कर पाने में कामयाब रहती है, तो
इससे अधिक प्रतिगामी बिहार के लिए कुछ नहीं हो सकता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण
राष्ट्रीय राजनीति का पिछले छह वर्षों का अनुभव है, और आगे कितने वर्षों तक देश
इसकी गिरफ्त में रहेगा, इसके बारे में विश्वासपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है। जिस
लालू यादव ने जिन साम्प्रदायिक ताकतों को करीब दो दशकों तक बैकफुट पर रखा और उस
स्थिति में बनाये रखा जिसमें तीन दशक बाद भी वह अपने दम पर सत्ता में आने की
स्थिति में नहीं है, उसी को मान्यता दिलवाने और मुख्यधारा में लाकर स्थापित करने
का श्री नीतीश जी के ‘धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व’ को जाता है। आज बिहार की राजनीति और
समाज का इतना सम्प्रदायीकरण हो चुका है कि जाती के दुष्चक्र से निकलता बिहार धर्म एवं
सम्प्रदाय के दुष्चक्र में फँसता दिखाई पड़ रहा है, और अगर ऐसा होता है, तो बिहार
के लिए इससे बुरा कुछ भी नहीं होगा।
विकास का राजनीतिक संकट:
अब सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार की राजनीति विकास की पटारी पर कैसे
लौटेगी? इसके लिए ज़रूरी है कि बिहार लालू-नीतीश-रामविलास के दुष्चक्र से भी बाहर निकले,
और दक्षिणपंथ की साम्प्रदायिक राजनीति के दल-दल में फँसने से भी बचे; और निकट
भविष्य में ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई पड़ रहा है। इन दो में से कहीं-न-कहीं बिहार को
फँसना ही है, और अगर ऐसा है, तो बिहार के मतदाता क्यों न एक नया प्रयोग करें? एक
चीज है जो बिहार को वर्तमान संकट से बाहर निकलने में समर्थ है, और वह है संसदीय राजनीति के ‘बैक टू द बेसिक्स’ की ओर लौटना।
और, संसदीय राजनीति का ‘बैक टू द बेसिक्स’ क्या है? तो, संसदीय राजनीति में हम
मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री को नहीं चुनते हैं, वरन् हम चुनते हैं अपने स्थानीय
प्रतिनिधि को, और हमारे स्थानीय प्रतिनिधि चुनते हैं अपने नेता को। इस स्थिति में जो
बहुमत दल का नेता होता है, वही मुख्यमन्त्री बनता है। मुझे लगता है कि आज बिहार
जिस मोड़ पर खड़ा है, उसमें कौन-सा दल किस ओर जाएगा और चुनाव-परिणाम आने के बाद
बिहार में महाराष्ट्र जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी, ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा
सकता है। ऐसी स्थिति में बिहार के मतदाता वोट डालते वक़्त इस बात को भूल जाएँ कि
कौन उम्मीदवार किस दल से है, वे जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक योग्य समझते हैं, जो
उनके मूल मसले पर चर्चा करता है, जिन तक उनकी आसानी से पहुँच हो सकती है, जो
उन्हें तोड़ने के बजाय जोड़ने की बात करता है, उन्हें उसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए और
उसे जिताने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए एक मतदाता के रूप में हमारी यह जिम्मेवारी
बनती है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों और उनके भविष्य के लिए अपने व्यक्तिगत
आग्रहों एवं दुराग्रहों से मुक्त होकर अपने संकीर्ण हितों को तिलाँजलि दें और एक
बार अपने क्षेत्र के उस उम्मीदवार के लिए मतदान करें जो सर्वाधिक योग्य है, जो चोर
और बेईमान नहीं है, गुण्डा और मवाली नहीं है, जिसकी छवि साफ़-सुथरी है, और जो समाज
को जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय के आधार पर तोड़ने का काम न करता हो, वरन् जोड़ने का
काम करता हो।
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